भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का स्वामी श्रद्धानन्द जी के बलिदान शताब्दी समारोह में संबोधन (HINDI)

कुरुक्षेत्र : 01.11.2026

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भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का  स्वामी श्रद्धानन्द जी के बलिदान शताब्दी समारोह में संबोधन (HINDI)

धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र की पावन धरती पर संस्कार और शिक्षा के इस महत्वपूर्ण केंद्र में आप सब के बीच उपस्थित होकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है।

मैं हरियाणा राज्य स्थापना दिवस की आप सब को हार्दिक बधाई देती हूँ। मुझे यह देखकर प्रसन्नता होती है कि विगत 60 वर्षों में हरियाणावासियों ने अपनी लगन और मेहनत के बल पर राज्य को कृषि, खेल-कूद, उद्योग जैसे अनेक क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। मेरी कामना है कि आप और आपका राज्य खूब प्रगति करें और विकास के राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अपना बहुमूल्य योगदान दे।

देवियो और सज्जनो,

आज हम यहां भारत के महान सपूत, स्वामी श्रद्धानन्द जी के 100वें बलिदान वर्ष में उन्हें श्रद्धाजंलि अर्पित करने के लिए एकत्रित हुए हैं। मुंशीराम से महात्मा मुंशीराम और फिर स्वामी श्रद्धानन्द बनने की उनकी जीवन-यात्रा अत्यंत प्रेरणादायक है। स्वामी श्रद्धानन्द जी वह दिव्य ज्योति थे जिन्होंने अनेक दीप प्रज्ज्वलित किए। उन्होंने अपना जीवन वेदों की सेवा और समाज के उत्थान के लिए समर्पित किया। उनका व्यक्तित्व और बलिदान हम सब के लिए प्रेरणा का स्रोत है। मैं उस युगद्रष्टा की पुण्य स्मृति को नमन करती हूं।

स्वामी श्रद्धानन्द जी ने वैदिक शिक्षा, नारी शिक्षा, कमजोर वर्गों के उत्थान, स्वाधीनता संग्राम और सामाजिक एकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। स्वामी जी स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रखर सेनानी थे। उनकी निडरता एवं साहस ने भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन को नई दिशा और ऊर्जा दी। वर्ष 1919 में दिल्ली के चांदनी चौक में उन्होंने रौलट एक्ट के विरोध में निकाले गए सत्याग्रह मार्च का बहादुरी के साथ नेतृत्व किया। जलियांवाला बाग घटना के बाद अमृतसर में कांग्रेस के अधिवेशन के आयोजन में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई।

स्वामी श्रद्धानंद जी सामाजिक एकता के प्रबल पक्षधर थे। उनका मानना था कि भारत की मुक्ति सामाजिक एकता को बनाए रखने में निहित है। दिल्ली के जामा मस्जिद के मंच से अपने उद्गार में उन्होंने आपसी सद्भावना और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया।

स्वामी श्रद्धानंद जी भारत की उन्नति के लिए अस्पृश्यता के कलंक को दूर करने एवं दलितोद्धार को सबसे आवश्यक मानते थे। उनके अनुसार छुआछूत जैसी कुप्रथा वैदिक धर्म के मूल भावनाओं के विपरीत थी। बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने उनके विचारों और कार्यों से प्रेरित होकर कहा था “The Swami was the greatest and the most sincere champion of the Untouchables”.

स्वामी जी ने अपने व्यक्तित्व और कार्यों से देश-विदेश में अनेक लोगों को प्रभावित किया था। ब्रिटेन के लेबर पार्टी के तत्कालीन नेता रैम्जे मैकडोनाल्ड ने उनके व्यक्तित्व और गुरुकुल की प्रशंसा की थी। वर्ष 1926 में उनकी हत्या के बाद Young India के एक अंक में स्वामी जी को श्रद्धांजलि देते हुए महात्मा गांधी ने लिखा था “Death is at any time blessed, but it is twice blessed for a warrior who dies for his cause.”

देवियो और सज्जनो,

उन्होंने गुरुकुल शिक्षा पद्धति को पुनर्जीवित और सुदृढ़ किया। इससे भारतीय शिक्षा और संस्कृति की धारा को नवजीवन मिला। आर्य समाज के संस्थापक, महर्षि दयानन्द सरस्वती ने शिक्षा की जिस पुरातन आर्य पद्धति को पुनर्जीवित करने पर बल दिया था उसके लिए स्वामी जी ने अथक प्रयास किए। गांव-गांव घूमकर धनराशि एकत्रित की और गुरुकुल की स्थापना की। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि उनके द्वारा स्थापित गुरुकुल चरित्रवान और संस्कारवान नागरिकों का निर्माण कर रहे हैं।

मुझे बताया गया है कि पिछले 114 वर्षों से गुरुकुल कुरुक्षेत्र भी स्वामी जी के मूल्यों और आदर्शों के अनुसार विद्यार्थियों में ज्ञान और संस्कार की अविरल धारा प्रवाहित कर रहा है। गुजरात के राज्यपाल की भूमिका निभाते हुए इस गुरुकुल को कुशल मार्गदर्शन देने के लिए मैं आचार्य देवव्रत जी को हार्दिक बधाई देती हूँ। उनकी दूरदर्शी सोच और प्रखर चिन्तन से इस परिसर में प्राचीनता और आधुनिकता का तथा परम्परा और प्रगति का अद्भुत संगम दिखाई देता है। मुझे यह जानकर खुशी हुई है कि यहां के विद्यार्थियों की जीवनचर्या में शिक्षा ग्रहण करने के साथ-साथ प्राकृतिक कृषि, गो-संरक्षण, दैनिक यज्ञ भी शामिल हैं। इस प्रकार यहाँ के विद्यार्थी न केवल शिक्षित बन रहे हैं बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और भारतीय परंपरा के संरक्षक भी बन रहे हैं।

देवियो और सज्जनो,

स्वामी श्रद्धानन्द जी के बलिदान का शताब्दी वर्ष का अवसर उनके प्रेरणादायक जीवन, उनके शैक्षिक और सामाजिक चिंतन और राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण और बलिदान से शिक्षा लेने का अवसर है। इस महत्वपूर्ण अवसर पर मैं यहाँ उपस्थित सभी लोगों, विशेषकर विद्यार्थियों और युवाओं से यह कहना चाहूँगी कि यदि आप जीवन में कुछ मूल मंत्रों को आत्मसात करके आगे बढ़ेंगे, तो इससे न केवल आपकी व्यक्तिगत उन्नति होगी, बल्कि समाज और राष्ट्र की प्रगति में भी आपका महत्वपूर्ण योगदान सुनिश्चित होगा।

 जीवन में परिवर्तन और आत्म-सुधार की संभावनाएँ सदैव विद्यमान रहती हैं। निरंतर सीखने, स्वयं को बेहतर बनाने और अपनी क्षमताओं का विकास करने का प्रयास करें।

 निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति में धैर्य, संयम और अनुशासन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दृढ़ संकल्प, निरंतर परिश्रम और आत्मविश्वास के बल पर कठिन से कठिन लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं।

 कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। प्रत्येक कार्य का अपना महत्व है। हर कार्य को पूरी निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण के साथ करें।

 सत्य और नैतिकता के पक्ष में खड़े रहने का साहस रखें। परिस्थितियाँ कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, अपने सिद्धांतों और मूल्यों के प्रति दृढ़ रहें।

 समाज के कल्याण और राष्ट्र की प्रगति में योगदान देना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज और देश के व्यापक हितों के लिए कार्य करें।

हम वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। देशवासियों द्वारा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करते हुए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, नवाचार और उद्यमशीलता को अपनाना इसके लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। मेरी कामना है कि स्वामी श्रद्धानंद जी के जीवन से प्रेरणा लेकर हमारे युवा एक शिक्षित, आत्मनिर्भर, समरस और सशक्त भारत के निर्माण में योगदान दें और विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में सहभागी बनें।

धन्यवाद, जय हिन्द! जय भारत!

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