भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु  का शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह में सम्‍बोधन (HINDI)

विज्ञान भवन : 05.09.2026

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भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु  का  शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह में सम्‍बोधन (HINDI)

‘राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार’ से सम्मानित आज के सभी पुरस्कार विजेताओं को मैं हार्दिक बधाई देती हूं।

देश के द्वितीय राष्ट्रपति, डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती को शिक्षक दिवस के रूप में मनाकर, हमारे देशवासी, उनके प्रति एवं समस्त शिक्षक समुदाय के प्रति, सम्मान व्यक्त करते हैं। जो समाज शिक्षकों का सम्मान करता है वह समाज सही अर्थों में प्रगतिशील होता है।

शिक्षकों के बीच आकर, मेरे अंदर विद्यमान विद्यार्थी और शिक्षक दोनों ही जीवंत हो जाते हैं। मुझे अपने शिक्षकों का सादर स्मरण होता है। उनके स्नेह और मार्गदर्शन के बल पर ही मैं अपनी जीवन-यात्रा में यहां तक पहुंच पाई हूं। साथ ही, मुझे अपने विद्यार्थी भी याद आते हैं जिन्हें मैंने ओड़िशा के राइरंगपुर में स्थित, श्री ऑरोबिंदो इंटीग्रल स्कूल में पढ़ाया था। मैंने अपने विद्यार्थियों से भी बहुत कुछ सीखा है। उन विद्यार्थियों के प्यार को मैं अपने जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि मानती हूं। मैं भी कभी शिक्षक समुदाय की सदस्या रही हूं, इससे मुझे विशेष सार्थकता का अनुभव होता है।

देवियो और सज्जनो,

सावित्रीबाई फुले, आधुनिक युग में, विद्यालय में पढ़ाने वाली, भारत की पहली शिक्षिका के रूप में जानी जाती हैं। बालिकाओं की शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने क्रांतिकारी पहल की थी और 19वीं सदी में, बालिका विद्यालयों की स्थापना की थी। आज के दिन, क्रांति-ज्योति-स्वरूपा, महान शिक्षिका, सावित्रीबाई फुले की स्मृति को, मैं सादर नमन करती हूं।

बीसवीं सदी के आरंभ में पश्चिम बंगाल के बोलपुर जिले में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘शांति-निकेतन’ की तथा ओड़िशा के पुरी जिले में प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी ‘उत्कल मणि’ पंडित गोपबंधु दास ने ‘वन विद्यालय’ यानी Open Air School की स्थापना की थी। उन विद्यालयों की स्थापना के पीछे यह उदात्त विचार था कि प्रकृति की गोद में विद्यार्थियों का सहज विकास होता है। देश को बहुआयामी योगदान देने वाले तथा सर्जनात्मक शिक्षा के प्रति विशेष रूप से समर्पित उन विभूतियों को मैं सादर नमन करती हूं।

इस सभागार में, लद्दाख से लेकर Andaman & Nicobar Islands तक, तथा अरुणाचल प्रदेश से लेकर गुजरात तक, पूरे देश में शिक्षण के श्रेष्ठ प्रतिमान स्थापित करने वाले शिक्षक उपस्थित हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि पुरस्कार विजेताओं में, गांव के स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की संख्या अधिक है। मुझे आशा है कि इस वर्ष के पुरस्कार विजेताओं की अध्यापन एवं प्रशिक्षण पद्धतियां और उपलब्धियां, अन्य शिक्षकों को भी शिक्षण में उत्कृष्टता के लिए प्रेरित करेंगी।

पुरस्कार विजेताओं के योगदान और उपलब्धियों पर केन्द्रित फिल्मों को देखकर, मेरा यह विश्वास और दृढ़ हुआ है कि निष्ठावान शिक्षक अग्रिम पंक्ति के राष्ट्र-निर्माता होते हैं।

आज पुरस्कृत सभी शिक्षकों ने समान रूप से प्रभावशाली और अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। लेकिन, समय की सीमा के कारण मैं केवल एक उदाहरण का उल्लेख करूंगी। हम सबने देखा कि राजस्थान के झालावाड़ जिले के एक गांव के स्कूल में, अपने शिक्षक के मार्गदर्शन में बच्चे, अत्यंत आधुनिक माध्यमों की सहायता से जीव विज्ञान का अध्ययन करते हैं। इससे, यह स्पष्ट होता है कि बड़ी सोच के बल पर, छोटे से छोटे स्थान पर, प्रबुद्ध शिक्षक और जिज्ञासु विद्यार्थी, उच्च-स्तरीय पठन-पाठन के आधुनिक उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं। मुझे यह जानकर प्रसन्नता होती है कि इस सभागार में उपस्थित शिक्षकों ने, ऐसे प्रेरक प्रयासों से, शिक्षण कार्य को नए आयाम दिए हैं।

‘शिक्षा मंत्रालय’ द्वारा स्कूलों, उच्च शिक्षण संस्थानों एवं polytechnics में अध्यापन करने वाले श्रेष्ठ शिक्षकों, तथा ‘कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्रालय’ द्वारा चुने गए सुयोग्य प्रशिक्षकों के योगदान को, राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी गई है। देश के विकास में, academic excellence, skill development और entrepreneurship का बहुत अधिक महत्व है। भारत को knowledge super-power बनाने के साथ-साथ, skill capital of the world के रूप में स्थापित करना, हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शामिल है।

यहां उच्च-शिक्षा के क्षेत्र में पुरस्कृत आचार्य-गण उपस्थित हैं। उनके लिए, तथा पूरे देश के आचार्यों के लिए, उच्च-शिक्षा में भारत का गौरवशाली इतिहास, लक्ष्य भी प्रस्तुत करता है और कसौटी भी। ह्वेन सांग ने लिखा है कि नालंदा-विक्रमशिला में पढ़ाने वाले आचार्यों का यश दूर-दूर के देशों तक फैल चुका था। उनका चरित्र पूर्णतः निर्मल और अनिंदनीय था। आचार्य-गण जानते थे कि समुद्रों और पर्वतों को पार करके, अनेक कष्ट सहन करके, विदेशों के छात्र उनके पास अपनी ज्ञान-पिपासा लेकर आते थे।

भारत के विश्व-विख्यात आचार्यों की परंपरा को नोबेल पुरस्कार विजेता आचार्य सी.वी. रामन जैसे शिक्षकों ने आधुनिक युग में आगे बढ़ाया। वे अपने विद्यार्थियों के साथ खूब घुल-मिलकर modern physics के विभिन्न विषयों पर चर्चा करते थे। जब विद्यार्थी उनसे कोई अच्छा प्रश्न करते थे तो वे पुस्तकों से हटकर, अपने विलक्षण अध्यापन से ऐसी जिज्ञासा जागृत करते थे कि उनके विद्यार्थी उन प्रश्नों के समाधान से जुड़े, विश्व के महान वैज्ञानिकों के मूल ग्रन्थों में अवगाहन करने लगते थे।

देवियो और सज्जनो,

भारत के प्रथम राष्ट्रपति, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि बच्चों की देखभाल करना, पौधों को जड़ से सींचने के बराबर है। School education शिक्षा व्यवस्था का आधार है। ज्ञान और कौशल तो कभी भी प्राप्त किए जा सकते हैं, परंतु बचपन में ही सदाचार की शिक्षा देना, अधिक प्रभावी सिद्ध होता है। आरंभिक कक्षाओं में बच्चों के बौद्धिक, शारीरिक और नैतिक विकास पर निष्ठापूर्वक ध्यान देकर हमारे शिक्षक, अच्छे विद्यार्थियों और कर्तव्य-निष्ठ नागरिकों की भावी पीढ़ियां तैयार करते हैं।

विद्यार्थी ही शिक्षकों की पहचान होते हैं। विद्यार्थी अपने शिक्षकों द्वारा पढ़ाया गया पाठ्यक्रम भले ही भूल जाएं, उनके व्यवहार को वे सदैव याद रखते हैं।

अनेक विद्यार्थी, आर्थिक दृष्टि से कमजोर परिवारों से आते हैं, कुछ अपने परिवार में पहली पीढ़ी के विद्यार्थी होते हैं, कुछ विद्यार्थी गांव के किसी सामान्य स्कूल से शहर के बड़े स्कूल में आते हैं और थोड़ा असहज हो जाते हैं, कुछ विद्यार्थी स्वभाव से ही संकोची होते हैं, कुछ विद्यार्थियों में बहुत प्रतिभा होती है लेकिन उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है तथा कुछ विद्यार्थियों को Children with special needs की श्रेणी में रखा जाता है।

ऐसे सभी विद्यार्थी, जो किसी कारण से, कोई कमी महसूस करते हैं, उनमें आत्मविश्वास जगाना, और उन्हें आगे बढ़ाना, शिक्षकों का विशेष दायित्व है। संस्कृत भाषा के शब्द ‘उद्धार’ का अर्थ होता है - खींचकर बाहर निकालना या नीचे से ऊपर ले आना। विद्यार्थियों का उद्धार करने का पुनीत अवसर केवल शिक्षकों को ही उपलब्ध होता है।

हमारे संविधान में निहित, ‘अवसर की समानता’ के आदर्श को, कार्यरूप देने का, सबसे प्रभावी माध्यम, शिक्षा है। हमारे देश में primary school dropout rate 12 वर्ष पहले लगभग साढ़े चार प्रतिशत था। अब यह dropout rate नहीं के बराबर है। यह उपलब्धि शिक्षकों के प्रयासों से संभव हो सकी है। इस राष्ट्रीय सफलता के लिए मैं सभी शिक्षकों की सराहना करती हूं।

हम सभी देशवासी, विकसित भारत के निर्माण के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहे हैं। विश्वस्तरीय शिक्षा व्यवस्था के बल पर ही, विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव है। हमारे शिक्षक, शिक्षा व्यवस्था में प्राण-वायु का संचार करते हैं। हमारा यह प्रयास होना चाहिए कि हमारे देश में एक भी विद्यार्थी, अच्छी शिक्षा के अवसरों से वंचित न रहे। मैं चाहूंगी कि हमारे शिक्षक, अपने स्नेह और समर्पण से, सभी विद्यार्थियों में ज्ञान, प्रेरणा, नैतिकता और संवेदनशीलता का संचार करें। इन्हीं कामनाओं के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देती हूं।

धन्यवाद! 
जय हिन्द!
जय भारत!

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