भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का राष्ट्रपति भवन में ‘भारत की शास्त्रीय भाषाओं के ग्रंथ कुटीर’ के उद्घाटन के अवसर पर संबोधन (HINDI)

रापत भवन : 23.01.2026

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सबसे पहले मैं आप सभी को वसंत के आगमन तथा बसंत पंचमी के पावन दिन की शुभकामनाएं व्यक्त करती हूं। आज सभी देशवासी विद्या की देवी मां सरस्वती की आराधना करते हैं। मैं मां शारदा को सादर नमन करती हूं। आज वाग्देवी सरस्वती की पूजा के पवित्र दिन, राष्ट्रपति भवन में ‘भारत की शास्त्रीय भाषाओं के ग्रंथ कुटीर’ के उद्घाटन समारोह में आप सब के बीच उपस्थित होकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। यह कुटीर भारत की शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में राष्ट्रपति भवन की ओर से किया जा रहा सामूहिक प्रयास है। इस ग्रंथ कुटीर के निर्माण में योगदान देने वाले सभी व्यक्तियों, संस्थानों, विश्वविद्यालयों, शोध केंद्रों, राज्य सरकारों और राष्ट्रपति भवन के अधिकारियों की मैं सराहना करती हूं।

मैं मानती हूं कि राष्ट्रपति भवन पूरे राष्ट्र का भवन है। इस भवन में भारतीयता की भावना को व्यक्त करने के लिए अनेक प्रयास किए गए हैं। ऐसे कुछ प्रयास हमारी देश-प्रेम की भावना से जुड़े हैं। भारत माता के परम वीर सपूतों के सम्मान में परमवीर दीर्घा अब राष्ट्रपति भवन में सुशोभित है। इस ग्रंथ कुटीर का निर्माण भी राष्ट्रपति भवन को भारतीय संस्कृति की विरासत तथा जीवंत परंपराओं से जोड़ने का एक प्रयास है। मुझे विश्वास है कि ऐसे प्रयासों के बल पर सामान्य-जन न केवल राष्ट्रपति भवन से और अधिक जुड़ाव महसूस करेंगे, बल्कि हमारी महान सभ्यता और संस्कृति के बारे में उनकी जानकारी भी बढ़ेगी।

देवियो और सज्जनो,

भारत के शास्त्रीय भाषाओं में रचित ज्ञान-विज्ञान, योग, आयुर्वेद और साहित्य ने सदियों से विश्व को दिशा दिखाई है। इन भाषाओं ने भारतीय संस्कृति को आधार प्रदान किया है। तिरुक्कुरल और अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथ आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद और व्याकरण जैसे विषयों का विकास इन भाषाओं के माध्यम से हुआ है। पाणिनि का व्याकरण, आर्यभट का गणित और चरक-सुश्रुत का चिकित्सा विज्ञान आज भी विश्व को आश्चर्य- चकित करते हैं।

आधुनिक भारतीय भाषाओं के विकास में भी शास्त्रीय भाषाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। इस प्रकार शास्त्रीय भाषाओं के माध्यम से भारत जैसे प्राचीन और विविधतापूर्ण देश में हमारी अखिल भारतीय सांस्कृतिक चेतना प्रवाहित होती है। इन भाषाओं के योगदान को सम्मान देने और इनके संरक्षण तथा संवर्धन को बढ़ावा देने के लिए इनको शास्त्रीय भाषा का विशिष्ट स्थान प्रदान किया गया है। इससे इन भाषाओं में अध्ययन को बढ़ावा मिल रहा है।

शास्त्रीय भाषाओं में संचित ज्ञान का भंडार हमें अपने समृद्ध अतीत से सीख लेकर उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए प्रेरित करता है। विरासत और विकास के इस समन्वय का हमारा मूल-मंत्र भी शास्त्रीय भाषाओं के महत्व को रेखांकित करता है।

सभी कर्तव्यनिष्ठ लोगों की ज़िम्मेदारी है कि हमारी भाषाओं की विरासत का संरक्षण और संवर्धन करें। मेरा मानना है कि विश्वविद्यालयों में शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन को बढ़ावा देना, युवाओं को कम से कम एक शास्त्रीय भाषा सीखने के लिए प्रेरित करना और पुस्तकालयों में इन भाषाओं में अधिक से अधिक पुस्तकें उपलब्ध कराना, इन भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

मुझे विश्वास है कि राष्ट्रपति भवन के इस ग्रंथ कुटीर में शास्त्रीय भाषाओं से जुड़ी सामग्री के संग्रह में निरंतर वृद्धि होती रहेगी। मेरी कामना है कि यह ग्रंथ कुटीर सभी आगंतुकों, विशेषकर युवाओं, को शास्त्रीय भाषाओं के बारे में जानने- समझने के लिए प्रेरित करे। मैं इस सराहनीय प्रयास से जुड़े सभी लोगों को हार्दिक बधाई देती हूं।

धन्यवाद!
जय हिन्द!
जय भारत!

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