भारत की राष्ट्रपति, श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में संबोधन (HINDI)
राष्ट्रपति भवन : 28.07.2026
(117.22 KB)आज भारत के राष्ट्रपति के रूप में मेरे चार वर्षों के कार्यकाल की प्रमुख गतिविधियों के चार संकलनों की प्रथम प्रतियां उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन जी से प्राप्त करके मुझे प्रसन्नता हुई है। इन पुस्तकों का विमोचन करने के लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं। इन पुस्तकों पर कार्य करने वाले प्रकाशन विभाग और राष्ट्रपति भवन के सभी लोगों की मैं सराहना करती हूं।
इन पुस्तकों के शीर्षक समावेशी लोकतन्त्र में हमारी आस्था को परिलक्षित करते हैं। मुझे विश्वास है कि ये सचित्र संकलन, राष्ट्रपति भवन की परंपराओं, कार्य-प्रणालियों और उनके बहुआयामी स्वरूप से पाठकों का परिचय कराएंगे। ये पुस्तकें देशवासियों को अपनी विरासत पर गर्व के साथ प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकें, इसी में इनकी सार्थकता है। मुझे खुशी है कि इस अवसर पर eminent personalities द्वारा लिखे गए articles के एक ओड़िआ संकलन का भी विमोचन किया गया है।
देवियो और सज्जनो,
जब मैंने 25 जुलाई 2022 को भारत के राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण किया था तब यह मेरे लिए सम्मान से अधिक दायित्व का विषय था। पिछले चार वर्षों में मैंने इसी कर्तव्य-भावना के साथ कार्य किया है। मैं राष्ट्रपति भवन में या विभिन्न राज्यों की यात्राओं के दौरान जब भी लोगों, विशेषकर युवाओं, से मिलती हूं तब मैं उन्हें प्रेरित करती हूं कि वे नैतिक मूल्यों से जुड़े रहें और देश एवं समाज की उन्नति के लिए कार्य करें। महिलाओं से मेरा आग्रह होता है कि वे स्वावलंबी बनें और आत्मविश्वास के साथ प्रगति के पथ पर आगे बढ़ें। मैं जनजातीय समुदाय के लोगों से संवाद करते समय अनुरोध करती हूं कि वे अपनी सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करें और विकास की मुख्य धारा में भी शामिल हों। मैं जब भी विदेश यात्रा पर जाती हूं तब वहां के भारतीय समुदाय से अवश्य मिलती हूं। मैं उनको भारत की विकास यात्रा में अधिक से अधिक योगदान देने के लिए प्रेरित करती हूं।
देवियो और सज्जनो,
हमारी Defence Forces राष्ट्र की सुरक्षा के प्रहरी हैं। मुझे सैनिकों से मिलने का जब भी अवसर मिलता है, मैं उनका मनोबल बढ़ाती हूं और उनके इस विश्वास को सुदृढ़ करती हूं कि देश उनके साथ खड़ा है। आज यह देखकर संतोष और गर्व होता है कि हमारी बेटियां भी देश की रक्षा में अपना योगदान दे रही हैं।
लोकतंत्र में राष्ट्रीय संस्थाएं जनता की हैं, जनता द्वारा निर्मित हैं और जनता के लिए हैं। मेरा मानना है कि राष्ट्रपति भवन राष्ट्र का भवन है। इसके द्वार सभी देशवासियों के लिए खुले हैं। न केवल राष्ट्रपति भवन में बल्कि मशोबरा, देहरादून और सिकंदराबाद स्थित राष्ट्रपति संपदाओं में अनेक सुविधाएं विकसित की गई हैं। राष्ट्रपति भवन ने देश भर के PVTG समूहों, स्वयं सहायता समूहों, पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों, ग्रामीण कलाकारों, innovators, उद्यमियों तथा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लोगों का स्वागत किया है।
देवियो और सज्जनो,
राष्ट्रपति भवन में राष्ट्र की विरासत और आकांक्षाओं की झलक दिखनी चाहिए। पिछले चार वर्षों में राष्ट्रपति भवन में देश की सोच और प्रगति को व्यक्त करने के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं। एक ओर जहां विरासत को सम्मान देने के लिए जनजातीय दर्पण और सूत्र कला दर्पण की स्थापना की गई है, वही दूसरी ओर innovation को प्रोत्साहित करने के लिए नवाचार कक्ष और स्किल सेंटर की भी स्थापना की गई है। गुलामी की मानसिकता को त्यागने के राष्ट्रीय प्रयास को बल देने के लिए राष्ट्रपति भवन में राजाजी की प्रतिमा स्थापित की गई है। भारत की शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए ग्रंथ कुटीर का निर्माण किया गया है। देश की रक्षा के सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करने वाले शूरवीरों को सम्मान देने के लिए परमवीर दीर्घा की स्थापना की गई है। राष्ट्रपति भवन परिसर को दिव्यांगजन सुलभ बनाया गया है।
प्रसिद्ध ओड़िआ संत कवि भीम भोइ जी ने लिखा है:
“मो जीवन पछे नर्के पड़ी थाउ, जगत उद्धार हेउ”।
अर्थात, अपने जीवन के हित-अहित से बड़ा जगत कल्याण के लिए कार्य करना होता है। उनकी यह पंक्ति मेरा आदर्श रही है और सदैव रहेगी। जन-कल्याण में निरत रहने की अपनी इसी भावना के साथ मैं आप सबके स्वर्णिम भविष्य की कामना करती हूँ।
धन्यवाद,
जय हिन्द!
जय भारत!
