भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का अलचिकि लिपि के शताब्दी महोत्सव में सम्बोधन(HINDI)
नई दिल्ली : 16.02.2026
(127.42 KB)आज अलचिकि लिपि के शताब्दी महोत्सव में शामिल होकर मुझे हार्दिक आनंद का अनुभव हो रहा है।
भारत वर्ष में अनेक जनजातीय समुदाय हैं। उनमें से संताल एक उपजाति है। संताल समुदाय के लोग देश के अनेक राज्यों के साथ-साथ नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और मॉरीशस जैसे देशों में भी निवास करते है। संताल समुदाय की अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति है। लेकिन पहले संताली भाषा की अपनी लिपि नहीं होने के कारण रोमन, देवनागरी, ओड़िआ, बांग्ला आदि लिपियों में इसे लिखा जा रहा था। नेपाल, भूटान, मॉरीशस में रह रहे संताल समुदाय के लोग भी उन देशों में प्रचलित लिपियों में संताली भाषा लिखा करते थे। इन लिपियों में संताली भाषा के मूल शब्दों का उच्चारण सही रूप से नहीं हो पा रहा था।
वर्ष 1925 में ओडिशा में मयूरभंज जिले के अंतर्गत रायरंगपुर के निकट डांडबोस गांव में जन्मे इतिहास पुरूष पंडित रघुनाथ मुर्मु ने अलचिकि लिपि का आविष्कार किया। उसके उपरांत संताली भाषा के लिए अलचिकि लिपि का उपयोग किया जा रहा है।
अलचिकि संताल समुदाय का एक सशक्त परिचय है। विश्वभर में संतालों की पहचान अलचिकि से हो रही है। यह संताल समुदाय के लोगों के बीच एकता स्थापित करने का एक प्रभावी माध्यम भी है।
देवियो और सज्जनो,
किसी लिपि का शताब्दी वर्ष समारोह आयोजित करना ऐतिहासिक महत्व रखता है। यह हमारे लिए अत्यंत गर्व और हर्ष का विषय है कि देश-दुनिया के अनेक क्षेत्रों में, विभिन्न संगठनों द्वारा अलचिकि लिपि का शताब्दी समारोह आयोजित किया गया और किया जा रहा है। ओडिशा सरकार द्वारा भी अलचिकि के शताब्दी वर्ष समारोह का आयोजन किया गया। फागुन संवाद पत्र की सक्रिय भागीदारी से केन्द्र सरकार द्वारा इस अलचिकि शताब्दी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
हमारे देश के साथ-साथ विदेशों में भी अलचिकि को पहचाना जा रहा है। डिजिटिल प्लेटफार्मों में भी अलचिकि का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा है। राष्ट्रपति भवन की वेबसाइट पहले अंग्रेजी एवं हिंदी में ही उपलब्ध थी। आप सबको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि अब संविधान की आठवीं अनुसूची की सभी 22 भारतीय भाषाओं में यह सुविधा प्रदान की गई है। संताली भाषा में राष्ट्रपति भवन की वेबसाइट अलचिकि लिपि में है।
झारखण्ड में राज्यपाल के मेरे कार्यकाल के दौरान लोकभवन का नाम अलचिकि लिपि में भी लिखा गया था। उसके साथ-साथ सभी सरकारी कार्यालयों के नाम भी अलचिकि लिपि में लिखे गए थे। संताल बहुल क्षेत्रों के स्कूल, कॉलेज, कार्यालयों आदि के नामों को भी अलचिकि में लिखने की जरूरत है। उसके साथ-साथ दीवारों के रंग-रोगन में भी अलचिकि का प्रयोग करने से गलियों, सड़कों आदि की सुंदरता और भी आकर्षक लगती है।
अलचिकि के शताब्दी वर्ष समारोह अगले कुछ दिनों में सम्पन्न हो जाएंगे। लेकिन इसके बाद भी इस लिपि के प्रचार-प्रसार को मजबूती के साथ आगे बढ़ाते रहने की जरूरत है।
हिंदी, अंग्रेजी, ओड़िया, बंगला जैसी भाषाओं में बच्चे पढ़ाई करें। लेकिन उसके साथ-साथ अपनी मातृभाषा संताली को अलचिकि लिपि में सीखना उनके लिए अत्यंत आवश्यक है।
संताली भाषा का विकास, प्रचार-प्रसार एवं साहित्य की रचनाएं, अनेक लेखकों और प्रसिद्ध व्यक्तियों के सामूहिक प्रयास से निरंतर जारी है। इसमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार योगदान देने वाले लेखकों एवं शोधकर्ताओं को मैं हृदय से धन्यवाद देती हूं।
संताली भाषा के प्रसार एवं मान्यता में मेरी भी भूमिका रही है। ओडिशा सरकार में मंत्री के अपने कार्यकाल के दौरान संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने में मैंने भी हर संभव प्रयास किया था। उस समय स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी भारत के प्रधानमंत्री थे। उनके आशीर्वाद से ही 22 दिसम्बर 2003 को संताली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। इस शुभ अवसर पर मैं माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के प्रति हृदय की गहराई से आभार व्यक्त करती हूं। आप लोगों को यह जानकर खुशी होगी कि श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती के अवसर पर, 25 दिसंबर 2025 को संताली भाषा एवं अलचिकि लिपि में लिखित भारत के संविधान की प्रति का मेरे द्वारा राष्ट्रपति भवन में विमोचन किया गया है।
लोकप्रिय बाल पत्रिका ‘‘चंदा मामा’’ संताली भाषा एवं अलचिकि लिपि में प्रकाशित हुई थी।
मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि वर्ष 2005 से, भारतीय साहित्य अकादमी द्वारा, अन्य भारतीय भाषाओं की तरह संताली भाषा के लेखकों को भी पुरस्कृत किया जा रहा है। यह भी इस भाषा के साहित्य का महत्वपूर्ण सम्मान है।
भाषा के रूप में मातृभाषा का प्रयोग होना चाहिए। गुरू गमके पंडित रघुनाथ मुर्मु का कथन है:
जानाम आयोय रेंगेज रेहं
उनी गेय हाःरा-हा
जानाम रड़दो निधान रेहं
अना तेगे मारांग्-आ।
(जननी यानी मां हमको पाल-पोस कर बड़ा करती है। वैसे ही मातृभाषा के सहारे लोग बड़े बन सकते है और आगे बढ़ सकते हैं।) अलचिकि के संबंध में गुरू गमके का एक और कथन है:
अल ताबो ढिलाग खान
आबो बो ढिलाग आ
हिरिज पासिर काते बो आदोग आ।
[लिपि (शिक्षा) की उपेक्षा करना स्वयं की उपेक्षा करना है और ऐसा करने से एक दिन हम सब विभाजित होकर अपनी पहचान खो देंगे।]
अल द बाराही काना
आबय तल दोहो बोना
मारसाल होर तेय अर ईदि बोना।
[लिपि (शिक्षा) एक रस्सी जैसी है जो हम सबको बांधकर प्रकाश (ज्ञान/चेतना) की ओर ले जाती है।]
देवियो और सज्जनो,
संताली साहित्य, बोली, गीत एवं आह्वान मंत्र के माध्यम से सशक्त होता रहा है। गुरू गमके पंडित रघुनाथ मुर्मु द्वारा अलचिकि लिपि के आविष्कार के साथ-साथ ‘दाड़े गे धन’, ‘खेरवाल बिर’, ‘बिदु-चांदान’ तथा ‘सिदु-कान्हू संताल हूल’ जैसे कालजयी रचनाओं के माध्यम से संताल साहित्य को समृद्ध किया गया है।
यह प्रसन्नता की बात है कि आजकल अनेक लेखकों द्वारा अपनी रचनाओं के माध्यम से संताली साहित्य को समृद्ध करने का काम किया जा रहा है। अनेक प्रसिद्ध संताली लेखक भारतीय साहित्य अकादमी से पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। विगत 11 वर्षों में 100 से अधिक जनजातीय समुदाय के भाई-
बहनों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। संताल भाइयों एवं बहनों को पद्मश्री सम्मान प्रदान करने का सुअवसर मुझे भी प्राप्त हुआ है। साहित्यकारों द्वारा अपने लेखन के माध्यम से लोगों को जागृत करने का कार्य करना नितांत आवश्यक है। आदिवासी समाज के लोगों को जागृत करना एक महान कार्य है।
देवियो और सज्जनो,
हमारा भारत देश अनेक भाषाओं का एक उद्यान जैसा ही है। भाषा और साहित्य एक डोर है, जिसके सहारे समुदाय में एकता बनाकर रखी जाती है। विभिन्न भाषाओं के बीच साहित्य के आदान-प्रदान से भाषाएं समृद्ध हो सकती हैं। यह आदान-प्रदान अनुवाद के माध्यम से होता है। भारत में अनुवाद का एक जीवंत इतिहास है। संताली भाषा के विद्यार्थियों को अनुवाद के द्वारा अन्य भाषाओं के लेखन से परिचय कराने की आवश्यकता है। इसी प्रकार अनुवाद एवं लेखन कार्य के माध्यम से संताली साहित्य को अन्य भाषाओं के विद्यार्थियों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
सभी देशवासियों सहित, जनजातीय समुदाय के लोगों का स्नेह और सम्मान मुझे निरंतर प्राप्त हो रहा है। इससे मुझे शक्ति मिलती है। मेरे स्नेहपूर्ण देशवासी, विरासत और विकास के रिश्ते को मजबूत बनाते हुए आगे बढ़ते रहें इसी आकांक्षा के साथ मैं अपने वाणी को विराम देती हूं।
धन्यवाद!
जय हिन्द!
जय भारत!
