भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह में सम्बोधन (HINDI)

नई दिल्ली : 07.08.2026

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आज राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर आप सबके बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। मैं देश के प्रतिभाशाली बुनकरों, डिजाइनरों, उद्यमियों, विद्यार्थियों और भारत के हथकरघा क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ देती हूँ।

हजारों वर्षों से हथकरघा भारत की प्रकृति-पोषक सभ्यता की विकास यात्रा का अभिन्न हिस्सा रहा है। इसमें हमारे राष्ट्र की असाधारण विविधता दिखाई देती है। इसने हमारी क्षेत्रीय विशेषताओं को संरक्षित भी किया है। हथकरघा क्षेत्र से रोजगार, महिला सशक्तीकरण, कला-संस्कृति और प्रकृति- प्रेम को बढ़ावा मिलता है। हथकरघा भारत के स्वतंत्रता संग्राम और आत्मनिर्भरता से भी जुड़ा रहा है।

हमारे ग्रामीण और जनजातीय समाजों ने प्रकृति के साथ सामंजस्य से जीने की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को सदियों तक सँजोया है। हथकरघा उस परंपरा का एक सशक्त उदाहरण है। प्रकृति के अनुरूप जीने की पद्धति की उपयोगिता आज समूचे विश्व में स्वीकारी जा रही है।

देवियो और सज्जनो,

हथकरघा क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएँ हैं। मुझे बताया गया है कि इस क्षेत्र में देश की 35 लाख से भी अधिक आबादी संलग्न है। विशेष बात यह है कि इसमें 25 लाख से अधिक महिलाएँ हैं। उनके सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसमें लगभग दो तिहाई कारीगर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों से संबंधित हैं। इस प्रकार यह क्षेत्र आजीविका सृजन के साथ-साथ समावेशी विकास का भी एक सशक्त माध्यम बना है।

देवियो और सज्जनो,

संत कबीर हथकरघा पुरस्कार से आज सम्मानित हुए वरिष्ठ बुनकर विशेष बधाई के पात्र हैं। इन सभी ने ही अपने दशकों के कामकाजी जीवन में केवल अपने कौशल को ही नहीं सँवारा। इन्होंने सैकड़ों बुनकरों को प्रशिक्षित और प्रेरित भी किया है। बुनकरों की नयी पीढ़ी तैयार करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभाशाली और कर्मठ बुनकरों को भी मेरी हार्दिक बधाई। पूर्वोत्तर से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर सुदूर दक्षिण तक — देश के अनेक राज्यों की हथकरघा शैलियों के बेजोड़ उदाहरणों का सृजन इन कर्मठ बुनकरों ने किया है। इनके उत्साह और कौशल की मैं सराहना करती हूँ।

हथकरघे का हमारे स्वतंत्रता संग्राम से गहरा जुड़ाव है। सात अगस्त 1905 को स्वदेशी आंदोलन का औपचारिक शुभारंभ हुआ था। बंगाल विभाजन के विरोध में शुरू हुए इस आंदोलन का उद्देश्य स्वदेशी वस्तुओं, स्वदेशी उद्योगों और विशेष रूप से देश के हथकरघा बुनकरों को प्रोत्साहन देना था। इसी ऐतिहासिक घटना के सम्मान में भारत सरकार 2015 से 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में मनाती आ रही है। अब यह एक औपचारिक वार्षिक आयोजन भर नहीं रह गया है।

यह उत्सव है हमारे देश की सांस्कृतिक एकता की इंद्रधनुषी विविधता का। यह अवसर है सरकार और बुनकर समाज के उन साझे प्रयासों को याद करने का जो भारत के हथकरघा सेक्टर को Premium Quality की छवि दे रहे हैं।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि हथकरघा क्षेत्र के बहुआयामी विकास के लिए सरकार ने विभिन्न हितधारकों के सक्रिय सहयोग से अनेक योजनाएँ और अभियान पिछले एक दशक से चलाये हैं। इनके सुपरिणाम अब सामने आने लगे हैं।

मुझे यह भी बताया गया है कि हाल ही में भारतीय हथकरघा उत्पादों के एक विशिष्ट Collection को Vishwa Sutra — Weaves of India for the World के रूप में वैश्विक Audience के सामने एक नये ढंग से प्रस्तुत किया गया। इससे भारतीय हैंडलूम को डिजाइन की एक नयी विधा मिली है।

देवियो और सज्जनो,

हमारे हथकरघा सेक्टर में भारत की Rural Premium Economy का सबसे सुंदर और मानवीय उदाहरण बनने की संभावनाएँ बलवती हुई हैं। महत्वपूर्ण हैंडलूम क्लस्टरों को आधुनिक प्रौद्योगिकी और सामयिक प्रशिक्षण विधियों से जोड़ा जा रहा है। बुनकरों की आय बढ़ाने के लिए अनेक पारदर्शी उपाय सरकार कर रही है। बुनकरों को उनकी मेहनत का पूरा लाभ सीधे मिलने के रास्ते खुले हैं।

भारतीय हथकरघा सेक्टर की अंतरराष्ट्रीय छवि निखर रही है। उसे और तेजी देते हुए इसे Verified Cultural Economy बनाने के लिए सरकारी प्रयास लगातार बढ़ रहे हैं। गृह सज्जा और Home Textile क्षेत्र में हैंडलूम को विशेष आर्थिक बढ़त मिलने की संभावनाएँ बन रही हैं।

‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान के द्वारा भी भारतीय हथकरघा को स्थानीय सीमाओं से निकालकर वैश्विक मंच तक पहुँचाया जा रहा है। इससे हमारे बुनकरों और शिल्पकारों को आर्थिक समृद्धि के नए अवसर भी मिल रहे हैं और विश्व के समक्ष भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और उत्कृष्ट शिल्प-कौशल की प्रतिष्ठा भी बढ़ रही है।

तकनीक और नवाचारी डिजाइनों के साथ अनेक प्रतिभाशाली युवा उद्यमी इस क्षेत्र में आने लगे हैं। सरकारी योजनाओं और संस्थानों से युवाओं की सजग Handholding होनी चाहिए ताकि उनके उत्साह और कौशल से इस सेक्टर की बहुआयामी सफलता की लंबी उम्र सुनिश्चित हो सके। युवा entrepreneurs, designers और startups, पारंपरिक शिल्प को नए trends, brands और global value chains से जोड़कर इस क्षेत्र में नए अवसरों का सृजन कर सकते हैं। भारतीय हथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थान और Weavers Service Centres के अंतर्गत कार्यरत Design Resource Centre युवाओं को इस क्षेत्र से जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। मुझे बताया गया है कि युवाओं को आधुनिक तकनीकों में प्रशिक्षित करने के साथ ही उनको नवाचार के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

इस क्षेत्र के सतत विकास के लिए नई technologies का उचित उपयोग आवश्यक है। आधुनिक digital solutions के माध्यम से बाजार तक पहुँच को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। साथ ही e-commerce platforms के माध्यम से भारतीय हथकरघा उत्पादों की पहुँच वैश्विक बाजारों तक और अधिक सशक्त बनाई जा सकती है। मुझे विश्वास है कि यह क्षेत्र देश के समावेशी विकास एवं आत्मनिर्भरता का सशक्त आधार बनेगा।

मैं हथकरघा क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों को शुभकामनाएँ देती हूँ और सभी पुरस्कार विजेताओं को एक बार फिर बधाई देती हूँ। मैं आप सभी के उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना करती हूँ।

धन्यवाद!
जय हिन्द!
जय भारत!

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