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अभिभाषण

भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का रायगढ़ दुर्ग की यात्रा के अवसर पर सम्बोधन

रायगढ़ : 06.12.2021
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भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का रायगढ़ दुर्ग की यात्रा के अवसर पर सम्

छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी का यह परिसर हम सबके हृदय में एक तीर्थ स्थल का स्थान रखता है। यह वीर माता जीजाबाई की पुण्य भूमि है।यह भारत के एक परमवीर सपूत शिवाजी महाराज की कर्म स्थली है।आज शिवाजी महाराज की समाधि पर अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का मुझे अवसर मिला जिस के लिए मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं।

मैं शिवाजी महाराज के वंशज, राज्यसभा सांसद श्री संभाजी छत्रपति महोदय को अपनी इस यात्रा के लिए धन्यवाद देता हूं। यह यात्रा मेरे लिए एक तीर्थ यात्रा की तरह है।मुझे बताया गया है कि शिवाजी महाराज की समाधि के जीर्णो द्धार में बाल गंगाधर तिलक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आधुनिक इतिहास के विद्यार्थी जानते हैं कि लोकमान्य तिलक ने ‘गणपति उत्सव’ और ‘शिवाजी उत्सव’ का आयोजन कर के जन साधारण द्वारा सामूहिक लक्ष्य के लिए सार्वजनिक रूप से एक जुट होने की परंपरा स्थापित की।गणपति उत्सव के द्वारा सांस्कृतिक गौरव तथा शिवाजी उत्सव के द्वारा देश प्रेम की भावना का संचार हुआ। महाराष्ट्र हमारी स्वाधीनता के संघर्ष का एक प्रमुख केंद्र बना रहा।

सत्रहवीं सदी में, शिवाजी महाराज ने ‘हिंदवी स्वराज’ की अवधारणा दी और अपने शौर्य के बल पर उसे यथार्थ स्वरूप प्रदान किया। मुझे लगता है कि जब महात्मा गांधी ने 20वीं सदी के आरंभ में ‘हिन्द स्वराज’ की अपनी परिकल्पना प्रस्तुत की तो कहीं न कहीं उनके चिंतन के आधार में ‘हिंदवी स्वराज’ का विचार रहा होगा।

इतिहास साक्षी है कि छत्रपति शिवाजी महाराज के कुश लने तृत्व में इस पूरे क्षेत्र का गौरव बढ़ा। राष्ट्र गौरव की, भारतीयता की भावना का फिर से उदय हुआ।उनके युद्ध कौशल और साहस के समक्ष मुगलों की विशाल सेनाएं भी भारत के इस क्षेत्र में अपना अधिकार स्थापित नहीं कर पाती थी। ऐसा कहा जाता है कि छत्रपति शिवाजी बड़ी सूझबूझ के साथ गुरिल्ला युद्ध का बहुत प्रभावी उपयोग करते थे। कुछ इतिहासकार शिवाजी महाराज को गुरिल्ला युद्ध के जनक के रूप में उल्लिखित करते हैं। बाद में शिवाजी महाराज की समग्र दृष्टि के अनुरूप पूरे देश में मराठा शक्ति का अभ्युदय देखा गया। छत्रपति शिवाजी द्वारा अपनाई गयी गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का उपयोग अंग्रेजों का मुक़ाबला करने में भी देश के कुछ भागो में स्वाधीनता सेनानियों द्वारा किया गया।

महाराष्ट्र केसरी शिवाजी महाराज के विराट चरित्र का 19वीं सदी की महत्वपूर्ण संस्कृत रचना ‘शिवराज विजय:’ में बहुत प्रभावशाली वर्णन किया गया है।मैं चाहूंगा कि उस पुस्तक का आज की विभिन्न प्रचलित भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो और उस पुस्तक का प्रसार होता कि हमारे देशवासी, विशेषकर युवापीढ़ी, शिवाजी महाराज के विशाल व्यक्तित्व और अनुपम कृतित्व से परिचित हो सकें।उस पुस्तक में शिवाजी महाराज के विलक्षण व्यक्तित्व के विवरण से यह शिक्षा मिलती है कि जो व्यक्ति कर्मठ एवं दृढ़ संकल्प वाले होते हैं उन्हें कोई भी बाधा लक्ष्य प्राप्त करने से रोक नहीं सकती।वीर शिवाजी के एक विश्वास पात्र अनुचर ने उन से जो सीखा था वह इन शब्दों में व्यक्त कि याथा:

‘कार्यम्वा साधये-यम्, देहम्वा पातये-यम्’

अर्थात कार्य सिद्ध करूंगा या देह त्याग कर दूंगा।

राष्ट्रीयता की भावना और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का साहस महाराष्ट्र की धरती में कूट कूट कर भरा हुआ है। उन्नीसवीं सदी में महात्मा फुले, सावित्री बाई फुले और महादेव गोविंद राना डे ने जिस सामाजिक ऊर्जा और चेतना को जन्म दिया उसे बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले तथा बाबा साहब आंबेडकर जैसी महाराष्ट्र से जुड़ी महान विभूतियों ने आगे बढ़ाया।राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी स्वाधीनता संग्राम के अंतिम चरण के दौरान सेवा ग्राम आश्रम से नेतृत्व प्रदान किया। ऐसा भी कहा जाता है कि निर्णायक दौर में, वर्धा में स्थित सेवा ग्राम ही हमारे स्वाधीनता संग्राम की राजधानी थी।

मुझे फरवरी 2018 में दिल्ली में आयोजित ‘शिवाजी जयंती समारोह’ में भाग लेने का अवसर मिला था। तब मुझे बताया गया था कि श्री संभाजी छत्रपति की पहल पर इस रायगढ़ किले में ‘शिवाजी राज्य अभिषेक महोत्सव’ आयोजित किया जाता है जिसमें हजारों की संख्या में लोग उत्साह पूर्वक भाग लेते हैं।राष्ट्रगौरव और पराक्रम के प्रतीक महाराष्ट्र केसरी शिवाजी के आदर्शों पर चलने वाले मराठा योद्धाओं को लेकर, मराठा लाइट इनफेंट्री गठित की गई। उस इनफेंट्री का युद्धघोष है, ‘बोल श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की जय’।सेना का सर्वोच्च कमांडर होने के नाते मैं गर्व का अनुभव करता हूँ कि हमारी सेना की एक महत्वपूर्ण टुकड़ी अपनी प्रेरणा के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज की जय जयकार करती है।

सत्रहवीं सदी में छत्रपति शिवाजी की सोच भविष्योन्मुखी थी। उन्होंने आठ मंत्रियों के अपने मंत्रि परिषद जिसे ‘अष्टप्रधान’ भी कहा जाता था, के सहयोग से अनेक दूरगामी प्रभाव के निर्णय लिए।भारत की पहली आधुनिक नौसेना का निर्माण छत्रपति शिवाजी ने ही किया। संयोग से विगत 4 दिसंबर को हमने नौसेना दिवस मनाया है और आगामी 8 दिसंबर यानि परसों ही मुझे नौसेना के एक समारोह में शामिल होना है। नौसेना में कार्यरत हमारे आज के नौसैनिक और अधिकारी गण भी शिवाजी महाराज से प्रेरणा लेते हैं।

पश्चिमी घाट और कोंकण का यह क्षेत्र विकास की अपार संभावनाओं से भरपूर है।मुझे विश्वास है कि इस क्षेत्र में रायगढ़ के इस ऐतिहासिक दुर्ग से प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ साथ आधुनिक विकास के दृश्य भी देखने को मिलेंगे। ऐसा करके हम छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज की परिकल्पना को 21वीं सदी के संदर्भ में और आगे बढ़ा सकेंगे।

धन्यवाद,

जयहिन्द!

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