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अभिभाषण

भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का "गंगा, पर्यावरण और संस्कृति" विषय पर जागरण फोरम में सम्बोधन

वाराणसी : 15.03.2021
भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का "गंगा, पर्यावरण और संस्कृति&quo

अपनी इस यात्रा के दौरान मुझे बाबा विश्वनाथ के दिव्य-दर्शन का सौभाग्य मिला। मां गंगा की संध्या आरती में भाग लेने का अवसर मिला। बाबा विश्वनाथ से सभी देशवासियों के स्वास्थ्य व समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त किया। मैं स्वयं को कृतार्थ अनुभव कर रहा हूं। पिछले बृहस्पतिवार के दिन पूरे विश्व में श्रद्धालुओं ने महा-शिवरात्रि का पर्व मनाया। हम सब जानते है कि शिव का अर्थ ही है - कल्याण। मुझे बताया गया है कि बनारस में एक अनूठी परंपरा है। महा-शिवरात्रि के अवसर पर, शिवजी की बारात निकलती है जिसमें समाज के हर वर्ग के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। शिवजी की बारात एक समावेशी समूह की कल्पना पर आधारित है। उस बारात में शामिल होने के लिए साज-सज्जा की आवश्यकता नहीं होती। यह सहजता ही बनारस को और शहरों से अलग करती है।

मेरा मानना है कि गंगा और हमारी संस्कृति एक दूसरे पर आधारित रहे है। इसी मां गंगा का शुद्ध होना, हमारे पर्यावरण की स्वच्छता का एक महत्वपूर्ण मापदंड है। परसों गंगा आरती में हम सब ने गंगा की स्वच्छता के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लिया।"गंगा, पर्यावरण और संस्कृति” का संरक्षण और संवर्धन हमारे देश के विकास का आधार है। ऐसे महत्वपूर्ण विषय पर इस चर्चा का आयोजन बहुत ही प्रासंगिक है। इस विषय पर गहन मंथन निरंतर होते रहने चाहिए। ऐसे मंथनों से निकले अमृत से जन-जन के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। इस आयोजन के लिए निरंतर अस्तित्व वाली विश्व की प्राचीनतम नगरी काशी से बेहतर कोई और स्थान नहीं हो सकता। अतः इस चर्चा को काशी में आयोजित करने के लिए मैं जागरण समूह की सराहना करता हूं।

मैं स्वयं को भी मां गंगा की करोड़ो संतानों में से ही एक मानता हूं। मेरा जन्म गंगा के किनारे बसे कानपुर देहात के एक गांव में हुआ। मेरा बचपन, छात्र-जीवन और युवावस्था, सभी गंगा के सान्निध्य में ही बीते हैं। मुझे गंगा के उद्गम स्थल–गंगोत्री –की यात्रा करने का सौभाग्य मिला। सन 2006 में मुझे कैलाश मानसरोवर की यात्रा का सुअवसर भी मिला जिसे एक प्रचलित लोक मान्यता के अनुसार गंगा का अदृश्य उद्गम स्थल भी माना जाता है। बिहार के राज्यपाल की ज़िम्मेदारी दी गई तो वहां भी मां गंगा के अंचल में कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ। राज्य-सभा सांसद के रूप में मुझे, हरिद्वार में गंगा के किनारे स्थित कुष्ठ रोगियों के बच्चों के विद्यालय में, छात्रावास के निर्माण में, अपनी सांसद निधि की एक बड़ी धन राशि का उपयोग करने का अवसर मिला।

जब मैं इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखता हूं तो मुझे लगता है कि गंगा की पवित्रता, निर्मलता और अविरलता सदैव मेरे जीवन में, मार्गदर्शन व प्रेरणा के प्रमुख स्रोत रहे हैं और आगे भी बने रहेंगे। वस्तुत:,हमारे जीवन मूल्यों मेंगंगा की पवित्रता का अर्थ है कि हम मन,वचन और कर्म से शुद्ध बने; गंगा की निर्मलता का अभिप्राय है कि हम निर्मल हृदय के साथ जीवन बिताए; और गंगा की अविरलता का तात्पर्य है कि बिना रुके हुए अपने जीवन पथ पर हम सतत आगे बढ़ते रहे। गंगा से जुड़ा यह संदेश पूरी मानवता के कल्याण के लिए है।

गंगा को केवल सिर्फ एक नदी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। गंगा भारतीय संस्कृति की जीवनधारा है तथा अध्यात्म और आस्था की संवाहिका है। हमारे देश में ऐसी मान्यता है कि भारत की सभी नदियों में गंगा का अंश है। गंगा के प्रति अनुराग, देश के उत्तर से दक्षिण व पूरब से पश्चिम तक –हर जगह व्याप्त है। अनेक श्रद्धालु भारत से गंगा-जल ले जाकर विदेश की नदियों में प्रवाहित करते हैं और इस प्रकार, उन नदियों को भी अपनी आस्था से जोड़ लेते हैं। इतना ही नहीं, आस्थावान लोग तो अन्य देशों की नदियों में भी गंगा का ही रूप देखते हैं। अपनी मॉरीशस यात्रा के दौरान मुझे वहाँ बसे भारत-वासियों ने गंगा-तालाब का दर्शन कराया। ऐसा लगता है कि हमारे देशवासी जहां भी जाते है,वे अपने साथ हृदय में गंगा को लेकर जाते है और उसे वहां किसी न किसी रूप में स्थापित कर देते हैं। इस प्रकार गंगा ने, भारतवासियों को विश्व के कोने-कोने में, मातृ भूमि के साथ तथा देश की संस्कृति और परंपरा के साथ जोड़े रखा है। वस्तुत: गंगा भारतवासियों की पहचान है और यह जन-भावना ही एक लोकप्रिय गीत में समाहित है और परिलक्षित भी होती है:

हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है।

गंगा से लगाव के अद्भुत उदाहरण बिस्मिल्ला खां साहब के संस्मरणों में पाए जाते है। उनसे कई संगीत-प्रेमी उन्हें मुंबई में बसने का अनुरोध किया करते थे। खां साहब कहा करते थे 'ले तो जाओगे, लेकिन वहां गंगा कहां से लाओगे।’

देवियो और सज्जनो,

गंगा तथा उसकी सहायक नदियों का क्षेत्र देश के ग्यारह राज्यों में फैला हुआ है और इसे ‘गंगा रिवर बेसिन’ का नाम दिया गया है। एक आकलन के अनुसार, इस क्षेत्र में देश की 43 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। यह सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र भी है।‘गंगा रिवर बेसिन’ की सभ्यता को जलीय सभ्यता कहा जा सकता है। गंगा-जल, सच में जीवन-जल है। इसलिए, ‘गंगा रिवर बेसिन’ में जल-संरक्षण करना तथा बाढ़ व कटान को कम करना, दोनों ही जरूरी हैं। इन दोनों उद्देश्यों के साथ गंगा की स्वच्छता और पर्यावरण के संरक्षण का लक्ष्य भी जुड़ा हुआ है।

गंगा और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए सन 2015 में ‘नमामि गंगे’ नामक एकीकृत ‘गंगा संरक्षण मिशन’ कार्यक्रम की शुरुआत की गई। मुझे संतोष है कि सरकार द्वारा शुरू किए गए इस मिशन के अच्छे परिणाम दिखाई देने लगे हैं। गंगा को निर्मल बनाने के लिए ऋषिकेश से गंगा-सागर तक बड़ी क्षमता के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जा रहे हैं।

भारत के प्रधानमंत्री और वाराणसी के सांसद श्री नरेंद्र मोदी जी ने गंगा की स्वच्छता और काशी के वैभव को बढ़ाने का बीड़ा उठाया है तथा इस दिशा में भगीरथ प्रयास किए हैं। आप सबको याद होगा कि अस्सी घाट की सफाई करने के लिए प्रधानमंत्री ने स्वयं फावड़ा चलाकर घाटों को स्वच्छ बनाने के अभियान की शुरुआत की थी। मुझे बताया गया है कि बनारस के घाट अब साफ सुथरे है। गंगा नदी व घाटों तथा बनारस शहर में स्वच्छता पर ज़ोर देने के कारण न केवल पर्यावरण संरक्षण को बल मिला है बल्कि पर्यटकों के लिएबनारस की यात्रा और अधिक आनंददायक हो गई है।

महात्मा गांधी को सन 1916 की बनारस की अपनी यात्रा के दौरान विश्वनाथ मंदिर की संकरी और गंदी गलियों को देखकर बहुत कष्ट हुआ था। वे इस बात से भी क्षुब्ध थे कि गंगा के किनारे बसे शहरों की सारी गंदगी गंगा में प्रवाहित की जाती थी। मेरा अनुभव भी यही है कि जहां मैं पला-बढ़ा, उस कानपुर शहर का औद्योगिक कचरा भी गंगा में बहाया जाता था। दशकों तक यह होता रहा। मुझे यह जानकर प्रसन्नता होती है कि कानपुर की टैनरीज़ एवं सीवेज से निकलने वाले प्रदूषित जल को साफ करने और शहर के कूड़े-कचरे के समुचित निस्‍तारण पर तेजी से काम किया जा रहा है।

देवियो और सज्जनो,

इस बार, काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के नए स्वरूप एवं आसपास के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तन को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। जैसा कि मैंने कहा था, विश्वनाथ मंदिर की संकरी गलियों और गंदगी को देखकर गांधीजी व्यथित हो गए थे। अब परिस्थिति बदल रही है। निकट भविष्य में ही मंदिर का एक भव्य स्वरूप देशवासियों के सामने होगा। काशी विश्वनाथ मंदिर तथा आसपास के परिसर का वह नया स्वरूप रानी अहल्याबाई होल्कर और महात्मा गांधी की आशाओं के अनुरूप होगा।

काशी का यह बदलता स्वरूप अपनी पुरातनता को भी संजोये हुए है। परंतु, पुरातनता का मतलब जड़ता नहीं है। किसी भी देश व समाज की जड़ता उसके क्षय और पतन का कारण बनती है। इसीलिए बनारस के लोगों से मेरा आग्रह है कि पुरातनता और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करें। हमारी परंपरा में एक सूक्ति है,"चलति एकेन पादेन, तिष्ठति एकेन बुद्धिमान्।”अर्थात बुद्धिमान व्यक्ति का एक पैर आगे बढ़ता है और दूसरा पैर जमीन पर रहता है। आगे बढ़ा हुआ पैर आधुनिकता है तथा जमीन पर टिका हुआ पैर हमारी परंपरा है। निरंतर आगे बढ़ते रहने के लिए परंपरा और आधुनिकता के बीच सामंजस्य का होना अनिवार्य है। यही सामंजस्य सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लिए भी जरूरी है।

गंगा को स्वच्छ रखना, पर्यावरण का संरक्षण करना और हमारी संस्कृति और धरोहर को समृद्ध बनाना केवल सरकारों का काम नहीं है बल्कि सभी देशवासियों का सामाजिक और व्यक्तिगत दायित्व भी है। इस सोच को देशव्यापी स्तर पर अपनाने और आत्मसात करने की जरूरत है। यह प्रसन्नता की बात है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान लोगों में जागरूकता बढ़ी है। अनेक संगठनों, विभिन्न कार्यक्षेत्रों के लोगों, विशेषकर मीडिया-कर्मियों ने तथा गंगा के किनारे बसे ग्रामवासियों ने गंगा की स्वच्छता के लिए सराहनीय योगदान दिया है।

देवियो और सज्जनो,

बनारस में अध्यात्म, साहित्य और संगीत का अद्भुत संगम रहा है। आज से लगभग छब्बीस सौ वर्ष पहले इसी क्षेत्र में स्थित सारनाथ में गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम संदेश दिया था। आदि शंकराचार्य को काशी में ही यह ज्ञान प्राप्त हुआ था कि सभी प्राणियों में एक ही ब्रह्म व्याप्त है। इसी काशी में संत रविदास और संत कबीर से लेकर गोस्वामी तुलसीदास तक की परंपरा ने साहित्य और अध्यात्म को विशालता दी, रूढ़िवाद का विरोध किया तथा ज्ञान, समता और सौहार्द का प्रकाश फैलाया। यहां के समरस समाज के ताने-बाने को यहां के मल्लाह, बुनकर, और साधु-संत विशेष स्वरूप प्रदान करते हैं।

काशी, देश के सर्वाधिक भारत-रत्नों की जन्मस्थली व कर्मभूमि रही है। लाल बहादुर शास्त्री, डॉक्टर भगवान दास, उस्ताद बिस्मिल्ला खां और पंडित रविशंकर बनारस में पैदा हुए और यहीं उन्होंने अपनी प्रतिभा को तराशा। इनके अलावा, महामना मदन मोहन मालवीय ने बनारस को ही अपनी मुख्य कर्मस्थली बनाया। इस तरह, आपके इस शहर के पांच भारत-रत्नों ने उत्कृष्टता और राष्ट्र सेवा के अद्भुत प्रतिमान स्थापित किए हैं।

देवियो और सज्जनो,

हमारे देश के एक बहुत बड़े भाग में पर्यावरण और संस्कृति का संरक्षण व संवर्धन तभी हो सकता है जब गंगा की धारा अविरल व निर्मल बनी रहे। संत कबीर ने कहा था:

कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर

यानि गंगा जल को ही निर्मलता की सबसे बड़ी कसौटी माना जाता था। संत रविदास भी पावन गंगा को ही मन की निर्मलता का आदर्श मानते थे।इसीलिए उन्होंने कहा था :

मन चंगा तो कठौती में गंगा

पिछली पीढ़ियों के लोग काशी में गंगा स्नान करने से पहले घर से स्नान करके जाते थे ताकि गंगा मैली न हो।इसलिए आज हम सबका दायित्व बन जाता है कि गंगा को एक बार फिर हम निर्मलता के उसी स्तर पर ले जाएं जिसका विवरण हम संत कबीर, संत रविदास तथा प्राचीन काल के ऋषि मुनियों की वाणी में पाते है। उसी स्तर की स्वच्छता को प्राप्त करने का लक्ष्य लेकर 'नमामि गंगे' तथा अन्य अभियान चलाए जा रहे है।

देवियो और सज्जनो,

देश के एक प्रमुख समाचार पत्र समूह द्वारा आयोजित इस फोरम में पत्रकारिता का उल्लेख सहज भी है और प्रासंगिक भी। देश में पत्रकारिता के इतिहास पर दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट होता है किसन 1920 के बाद भारतीय पत्रकारिता पर गांधीजी का गहरा प्रभाव पड़ा था। गांधीजी स्वयं भी पत्रकार थे। गांधीजी के समकालीन पत्रकारों में महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबूराव विष्णु पराड़कर और मुंशी प्रेमचंद जैसे संपादक थे। काशी में सक्रिय रहे बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसी विभूतियों ने भारत की पत्रकारिता को नए आयाम दिए। उन्होंने राष्ट्रपति, संसद और संविधान जैसे नए शब्दों से हिन्दी को समृद्ध किया। उनके समय में पत्रकारिता का स्तर इतना ऊंचा था कि उसे साहित्य का ही अंग माना जाता था। उस पीढ़ी की पत्रकारिता के आधार में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक उत्थान की भावना थी। उन सभी ने भारतीयता पर बहुत बल दिया था। गांधीजी ने सन 1919 में यंग इंडिया में लिखा था,"…..देशी भाषाओं के अखबारों की कितनी ज्यादा जरूरत महसूस की जाती है। मुझे यह सोचकर गर्व का अनुभव होता है कि किसानों और मजदूरों के बीच मेरे पत्र के इतने अधिक पाठक हैं। ..... भारत की आबादी के 90 प्रतिशत लोग इसी वर्ग के हैं। अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाएं तो भारत की विशाल आबादी के इस अगाध सागर का एक तट भर छू पाती हैं।”गांधीजी के इन विचारों के परिप्रेक्ष्य में दैनिक जागरण सहित भारतीय भाषाओं में छपने वाले समाचार पत्रों की बढ़ती लोकप्रियता बहुत महत्वपूर्ण है। विभिन्न आकलनों के अनुसार आज देश में सबसे अधिक पढ़े जाने वाले समाचार पत्र भारतीय भाषाओं में छपते हैं। इसके लिए आप सब बधाई के पात्र हैं। साथ ही, समाज और देश के प्रति आप सब की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गई है।

इस फोरम के जरिए सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने और उन मुद्दों पर समाज को जिम्मेदारी का एहसास कराने का दैनिक जागरण समूह का यह प्रयास अत्यंत सराहनीय है। मुझे विश्वास है कि इस आयोजन में होने वाले विचार-विमर्श से गंगा, पर्यावरण और संस्कृति के पारस्परिक संबंध के विषय में सजगता तथा सक्रियता बढ़ेगी। मैं आशा करता हूं कि चर्चाओं की यह श्रृंखला गंगा को स्वच्छ, पर्यावरण को बेहतर एवं संस्कृति को समृद्ध बनाने में उपयोगी सिद्ध होगी।

धन्यवाद,

जय हिन्द!

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