• Skip to Main Content /
  • Screen Reader Access

अभिभाषण

भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का ‘अहिंसा विश्व भारती’ द्वारा ‘अध्यात्म द्वारा समाज और मानवता का उत्थान’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में सम्बोधन

नई दिल्ली : 26.09.2019
  • डाउनलोड : भाषण नई विंडो में खुलती है पीडीएफ फाइल. पीडीएफ फाइल को खोलने के लिए कैसे पता करने के लिए साइट के तल पर स्थित सहायता अनुभाग में देखें. ( 0.25 एमबी )
भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का ‘अहिंसा विश्व भारती’ द्वारा ‘अध्यात्

1. अगले सप्ताह 2 अक्तूबर को हम सब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाएंगे। संयुक्त राष्ट्र द्वारा महात्मा गांधी के जन्मदिन को ‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मान्यता दी गई है। इसका अर्थ है कि महात्मा गांधी का अहिंसा का दर्शन, पूरे विश्व के लिए उपयोगी है। साथ ही, यह विश्व-स्तर पर गांधीजी के लिए गहरे सम्मान का भी एक प्रमाण है।

2. दो दिन पहले ही मुझे ‘गांधी कथा’ पर आधारित एक कार्यक्रम का शुभारंभ करने का अवसर मिला जहां बापू की जीवन-गाथा से जुड़े प्रसंगों पर अर्थ पूर्ण चर्चा हुई। राष्ट्रपति के रूप में अब तक मुझे गांधीजी पर केन्द्रित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में भाग लेने का सौभाग्य मिला है। इन आयोजनों के माध्यम से, जीवन के हर कार्य क्षेत्र से जुड़े विषयों पर गांधीजी के सुझावों के बारे में विचार-विमर्श से जुड़ने का मुझे अवसर मिला है। मुझे यह देखकर प्रसन्नता का अनुभव होता है कि गांधीजी के आदर्शों की प्रासंगिकता के विषय में लोग सचेत भी हैं और सक्रिय भी। मुझे विश्वास है कि उन मूल्यों के प्रति सजगता और कर्मठता हमारे देश को तथा पूरे विश्व को बेहतर बनाएगी।

3.‘अध्यात्म द्वारा समाज और मानवता का उत्थान’ जैसे महत्वपूर्ण विषय पर इस कार्यक्रम का आयोजन करने के लिए मैं ‘अहिंसा विश्व भारती’ के संस्थापक-अध्यक्ष आचार्य लोकेश मुनि और उनकी पूरी टीम को बधाई देता हूं। मुझे बताया गया है कि आचार्य लोकेश जी के नेतृत्व में यह संस्था भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व में अहिंसा, शांति एवं सद्भावना की स्थापना, मानवीय मूल्यों के उत्थान तथा राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में निरंतर प्रयत्नशील है। ऐसे प्रयास सराहनीय हैं।

4. विश्व में शांति एवं अहिंसा स्थापित करने के लिए आध्यात्मिक मूल्यों का प्रचार-प्रसार अनिवार्य है, इस तथ्य को महात्मा गांधी ने गहराई से समझा था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि सत्य, अहिंसा, शांति और सद्भाव पर आधारित व्यवस्थाओं के बल पर ही मानव समाज का उत्थान संभव है। गांधीजी के ये विचार आज भी प्रासंगिक हैं, और सदैव प्रासंगिक रहेंगे।

5. आतंकवाद, अराजकता की हिंसक वारदातों, भ्रष्टाचार और अनैतिकता, आर्थिक, धार्मिक, नस्ल और भाषा के आधार पर हो रहे मतभेदों तथा क्लाइमेट-चेंज की चुनौतियों जैसे अनेक मुद्दों का सामना करने में, गांधीजी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। अतः उनके द्वारा सुझाए गए रास्तों पर चलना, आधुनिक विश्व समुदाय के लिए, सहायक सिद्ध होगा।

देवियो और सज्जनो,

6. गांधीजी की आध्यात्मिक दृष्टि पर जैन दर्शन का गहरा प्रभाव था।जैन साधक और कवि श्रीमद् राजचन्द्र से गांधीजी को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त हुआ था। गांधीजी ने ‘अहिंसा परमो धर्म:’ के सिद्धान्त को दृढ़ता के साथ अपनाया।उनकी संवेदनशीलता के दायरे में सभी पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी शामिल थे। प्रकृति से उनका गहरा लगाव था। वे पेड़-पौधों की रक्षा और पानी की बचत पर बहुत ज़ोर देते थे। प्रकृति के प्रति संवेदनशील न रहने के कारण आज पूरे विश्व को क्लाइमेट-चेंज की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। आज, केवल हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में पर्यावरण के हित में चल रहे अनेक प्रयास, गांधीजी के विचारों को यथार्थ रूप देते हैं। पर्यावरण एवं जल संरक्षण के लिए गांधीजी का आग्रह उनकी दूरदर्शिता को रेखांकित करता है। ऐसी दूरदर्शिता, अध्यात्म के स्रोत से ही निकलती है और इसीलिए, हर युग में प्रासंगिक रहती है।

7. गांधीजी की आध्यात्मिक सोच का दायरा बहुत व्यापक है। उसमें गौतम बुद्ध, तीर्थंकर महावीर और गुरु नानक के मूलभूत विचारों का संगम है। साथ ही विश्व के सभी प्रमुख धर्म-ग्रन्थों के मूल तत्वों और जॉन रस्किन, हेनरी डेविड थोरो तथा लियो टॉल्सटॉय के आध्यात्मिक विचारों का भी समन्वय है। यह सर्व-धर्म-समभाव को आचरण में लाने वाली आध्यात्मिक दृष्टि है। इस आध्यात्मिक दृष्टि में धर्म का तात्पर्य रिलीजन, मजहब या पंथ नहीं है। सामान्य व्यवहार में जिसे रिलीजन, मजहब या पंथ समझा जाता है वह बाहरी आचार एवं उपासना पद्धतियों से जुड़ा होता है। लेकिन धर्म का वास्तविक स्वरूप प्रकृति के सहज, शाश्वत और सार्वभौम नियम से जुड़ा होता है। वह आंतरिक सत्य से जुड़ा होता है। करुणा, उदारता, सत्य, प्रेम और आंतरिक शुचिता जैसे आध्यात्मिक आयाम ही धर्म के मूल तत्व हैं। वहां किसी भी प्रकार की शत्रुता, वैमनस्य या भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है।

8. सभी धर्मों के मूल में पूरी मानवता के कल्याण की भावना विद्यमान है। गांधीजी ने धर्म के इसी आध्यात्मिक स्वरूप को अपनाया। पूरी मानवता के कल्याण की यही भावना समस्त विश्व को एक ही परिवार मानने वाले ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के संदेश में भी निहित है जो कि भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। गांधीजी ने अपने आचरण द्वारा इस भावना को यथार्थ रूप दिया। यही वजह है कि महात्मा गांधी करोड़ों भारतवासियों की आवाज तो बने ही, साथ-साथ, वे एक प्रकार से आधुनिक विश्व में पूरी मानवता की आवाज बन गए। आध्यात्मिकता की जो असाधारण शक्ति गांधीजी में थी, उसे विज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने वाले एल्बर्ट आइन्स्टाइन ने पहचाना था। गांधीजी के व्यक्तित्व के बारे में आइन्स्टाइन ने कहा था कि,"आने वाली पीढ़ियां इस बात पर मुश्किल से यकीन कर पाएंगी कि कभी हाड़-मांस और रक्त से बना एक ऐसा व्‍यक्ति भी इस धरती पर अवतरित हुआ था”।

देवियो और सज्जनो,

9. एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा यूरोप के विभिन्न देशों की अपनी यात्राओं के दौरान, मैंने वहां के लोगों में महात्मा गांधी के लिए गहरे आदर का भाव देखा है। राष्ट्रपति के रूप में मेरी पहली विदेश यात्रा का पहला कार्यक्रम अफ्रीकी देश जिबूती में नेल्सन मंडेला स्क्वेयर पर गांधीजी की मूर्ति पर माल्यार्पण करना था। इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूं। अपनी हाल की यूरोप यात्रा के दौरान स्विट्ज़रलैंड में लेक जेनेवा के पास मुझे महात्मा गांधी की प्रतिमा का अनावरण करने का सुअवसर मिला। जिस चौराहे पर बापू की वह प्रतिमा स्थापित की गई है उसे गांधी स्क्वेयर का नाम दिया गया है।

10. आप में से बहुत से लोग यह जानते होंगे कि गांधीजी के 150वें जयंती वर्ष के उपलक्ष में, महात्मा गांधी के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ को, विश्व के लगभग 155 देशों में, वहां के कलाकारों ने, अपने स्वर में गाया है। स्लोवीनिया की मेरी हाल ही की यात्रा के दौरान, इसी 17 सितंबर को, वहां बसे भारत के लोगों के एक कार्यक्रम में, ऐना विपोतनिक नाम की एक बेटी ने, बहुत मधुर स्वर में, यह भजन मेरे समक्ष प्रस्तुत किया। इस भजन का इतने अधिक देशों में आत्मीयता के साथ गाया जाना भारत के राष्ट्रपिता को विश्व-समुदाय की संगीतांजलि है।

11. भारत के राष्ट्रपिता के लिए यह विश्व-व्यापी सम्मान प्रत्येक भारतवासी के लिए गर्व की बात है। लेकिन, इस गर्व की सार्थकता तभी मानी जाएगी जब हम सब भारतवासी, राष्ट्रपिता के नैतिक आदर्शों को अपने निजी और सामाजिक आचरण में ढालकर बेहतर समाज का निर्माण करने में अपना योगदान देते रहेंगे।

12. गांधीजी मानते थे कि ‘सर्वोदय’ यानि सबका उदय ही आदर्श समाज व्यवस्था है। सर्वोदय की व्यवस्था का आधार है - सबके लिए प्रेम की भावना। गांधीजी का दृढ़ विश्वास था कि इस प्रकार के प्रेम, नैतिकता और अध्यात्म पर आधारित जीवन के द्वारा ही शांति स्थापित हो सकती है।

13. देश की आदर्श व्यवस्था के लिए गांधीजी का जो सपना था वह भी आध्यात्मिक मूल्यों पर ही आधारित था। अपनी ‘हिन्द-स्वराज’ पुस्तक में गांधीजी ने ‘द्वेष-धर्म की जगह प्रेम-धर्म’; ‘हिंसा की जगह आत्म-बलिदान’ और ‘पशुबल के खिलाफ आत्म-बल’ का प्रबल समर्थन किया है।

14. आध्यात्मिक मूल्यों के बल पर ही गांधीजी ने भय और आतंक में जकड़े हुए भारतवासियों को अहिंसापूर्ण क्रान्ति का रास्ता दिखाया, उन्हें निर्भीक बनाया। अध्यात्म और संघर्ष के इस अनोखे समन्वय को आचार्य विनोबा भावे ने बड़े प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त किया है। उन्होंने कहा है कि गांधीजी में क्रांति और शांति का अपूर्व संगम दिखाई देता था।

15. इस सभागार में बैठे बहुत से लोगों को याद होगा कि सन 1982 में गांधीजी की जीवनगाथा पर आधारित रिचर्ड एटनबरो की एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी। उस फिल्म का दर्शकों पर, विशेषकर युवाओं पर, बहुत प्रभाव पड़ा था। आज भी यह जरूरी है कि भारत की और समूचे विश्व की युवा पीढ़ी गांधीजी के विषय में जाने और उनके आदर्शों को अपनाए।

16. आज हमारे देश की 65 प्रतिशत आबादी युवाओं की है। इन युवाओं को गांधीजी के आदर्शों से जोड़ना बेहतर समाज बनाने के हमारे प्रयास में सहायक सिद्ध होगा। इसलिए मैं चाहूंगा कि ‘अहिंसा विश्व भारती’ के कार्यक्रमों में युवाओं की अधिक से अधिक भागीदारी हो।

17. मैं ‘अहिंसा विश्व भारती’ संस्थान को नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रसार हेतु किए जा रहे प्रकल्पों में सफलता की शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद

जय हिन्द!

Go to Navigation