भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का 65वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी एवं तृतीय प्रिंट द्विवार्षिकी भारत के पुरस्कार समारोह में संबोधन

नई दिल्ली : 21.10.2026

डाउनलोड : भाषण भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का  65वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी एवं तृतीय प्रिंट द्विवार्षिकी भारत के पुरस्कार समारोह  में संबोधन(हिन्दी, 117.42 किलोबाइट)

भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का  65वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी एवं तृतीय प्रिंट द्विवार्षिकी भारत के पुरस्कार समारोह  में संबोधन(HINDI)

इस पुरस्कार समारोह के अवसर पर आप सबके बीच उपस्थित होना मेरे लिए प्रसन्नता की बात है। यह केवल एक पुरस्कार समारोह नहीं, बल्कि भारत की कलात्मक विरासत, सांस्कृतिक विविधता और समकालीन सृजनशीलता का उत्सव है। भारत की विविध कलाओं की समृद्ध परंपरा, सृजनात्मक ऊर्जा और निरंतर विकसित होती कलात्मक अभिव्यक्तियों का आज उत्सव मनाया जा रहा है। मैं सभी पुरस्कार विजेताओं, चयनित कलाकारों तथा प्रतिभागियों को हार्दिक बधाई देती हूँ।

कला केवल कैनवास पर उकेरी गई आकृतियों, पत्थर में तराशी गई मूर्तियों अथवा विभिन्न माध्यमों से निर्मित कलाकृतियों तक सीमित नहीं है। कला हमारी संस्कृति का दर्पण है। इसमें हमारे अतीत की स्मृतियाँ, वर्तमान के अनुभव और भविष्य की आकांक्षाएँ प्रतिबिंबित होती हैं। कला हमें अपने समय और समाज को नए दृष्टिकोण से देखने और समझने का अनुभव कराती है।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि इस राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में देशभर के कलाकारों ने उत्साह के साथ भाग लिया है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों और North East जैसे दूर के क्षेत्रों तक, कलाकार अपनी विशिष्ट दृष्टि और अनुभवों के माध्यम से भारतीय कला को निरंतर समृद्ध कर रहे हैं।

देवियो और सज्जनो,

इस वर्ष की राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में विभिन्न विषयों और दृष्टिकोणों को अभिव्यक्त करने वाली कलाकृतियाँ भारतीय कला की व्यापकता और निरंतर विकसित होती प्रकृति को दर्शाती हैं।

Printmaking भी कला को समाज तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। यह प्रसन्नता का विषय है कि इस Third Print Biennale India - 2026 के लिए अंतरराष्ट्रीय कलाकारों ने भी भागीदारी की है। ऐसे आयोजन कला के माध्यम से विभिन्न देशों, संस्कृतियों और विचारधाराओं के बीच संवाद स्थापित करने के भी माध्यम हैं। विभिन्न भौगोलिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों के कलाकार जब एक साझा मंच पर आते हैं, तो वे अपने अनुभवों, विचारों और तकनीकों का आदान-प्रदान करते हैं। इससे कला की भाषा अधिक व्यापक, समावेशी और समृद्ध बनती है।

देवियो और सज्जनो,

हमारे देश की सांस्कृतिक शक्ति उसकी विविधता में निहित है। हमारी भाषाएँ, परंपराएँ, लोक कलाएँ और क्षेत्रीय अभिव्यक्तियाँ हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत को विशिष्ट बनाती हैं। पुरस्कार तो केवल कुछ कलाकारों को ही प्रदान किए जाते हैं, लेकिन कला की दुनिया में सृजन की प्रत्येक यात्रा का अपना महत्त्व है। आज के समय में कलाकारों के लिए रचनात्मक अवसरों के साथ-साथ आर्थिक सहयोग और उनकी कलाकृतियों को व्यापक बाजार तक पहुँचाने और art collectors से जोड़ने के अवसर भी आवश्यक हैं। मुझे प्रसन्नता है कि ललित कला अकादेमी एवं संस्कृति मंत्रालय कलाकृतियों की बिक्री को प्रोत्साहित करने के लिए भी प्रयास कर रहे हैं। यह प्रयास किया जा रहा है कि उनकी कलाकृतियों को बड़े पैमाने पर लोग देख सकें और उन्हें कलाकृतियों का उचित मूल्य प्राप्त हो सके। ऐसे प्रयास देश की creative economy को भी मजबूत बनाएंगे।

सभी हितधारकों का यह प्रयास होना चाहिए कि कला की पहुँच केवल कला दीर्घाओं तक सीमित न रहे, बल्कि वह विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक स्थलों और समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचे। विशेष रूप से युवा और उभरते कलाकारों को अपनी प्रतिभा को विकसित करने, नए माध्यमों को अपनाने और अपनी रचनात्मक क्षमता का विस्तार करने के लिए पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए। मैं कामना करती हूँ कि कला और कलाकारों के हित में किए जा रहे सभी प्रयास प्रभावी सिद्ध हों। मैं आप सबको बहुत-बहुत बधाई देती हूँ।

धन्यवाद!
जय हिन्द!
जय भारत!

समाचार पत्रिका के लिए सदस्यता लें

सदस्यता का प्रकार
वह न्यूज़लेटर चुनें जिसकी आप सदस्यता लेना चाहते हैं।
सब्सक्राइबर का ईमेल पता