भारत की माननीया राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का नालंदा विश्वविद्यालय, बिहार के दीक्षांत समारोह में संबोधन
राजगीर : 31.03.2026
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नालंदा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भाग लेकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। आज का समारोह सभ्यतागत संकल्प को परिपुष्ट करता हैः वह संकल्प कि ज्ञान कायम रहेगा, संवाद की प्रधानता बनी रहेगी, और विद्या से मानवता की सेवा होती रहेगी।
मैं उपाधि प्राप्त करने वाले सभी विद्यार्थियों को हार्दिक बधाई देती हूं। आपकी उपलब्धियां दृढ़-निश्चय, अनुशासन और प्रज्ञात्मक प्रतिबद्धता का परिणाम हैं। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि आज उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में आधे से अधिक विद्यार्थी 30 से अधिक देशों के अंतर्राष्ट्रीय विद्यार्थी हैं। मैं विश्वविद्यालय के संकाय सदस्यों और कर्मचारियों तथा उन सभी परिवारजनों की प्रशंसा करती हूं जिन्होंने इन युवा प्रतिभाओं की शैक्षणिक-यात्रा में सहयोग दिया है।
देवियो और सज्जनो,
आज महावीर जयंती के शुभ अवसर पर मैं सभी लोगों को हार्दिक बधाई देती हूं। लगभग एक ही कालखंड में अवतरित होने वाले भगवान महावीर और भगवान बुद्ध ने बिहार के इसी क्षेत्र से पूरी मानवता को अहिंसा, करुणा और प्रेम का संदेश दिया था।
पांचवीं शताब्दी में स्थापित प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय लगभग आठ शताब्दियों तक ज्ञान के एक महान केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित रहा। नालंदा का पतन केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक बहुत बड़ी क्षति थी। फिर भी, नालंदा की अवधारणा जीवंत रही। हमारे समय में इसका पुनरुत्थान उस गौरवशाली विरासत को आधुनिक परिवेश में पुनः स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह पुनरुत्थान दूरदर्शी नेतृत्व, सतत संस्थागत प्रयासों और सहयोगी देशों के समन्वय से संभव हो पाया है। यह इस बात का उदाहरण है कि साझा मूल्यों के आलोक में विभिन्न राष्ट्र उच्च लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। यह देखकर प्रसन्नता होती है कि आज का नालंदा विश्वविद्यालय भी अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को आकर्षित कर रहा है। यह नालंदा विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित ज्ञान एवं शिक्षा केंद्र के रूप में पुनः उभरने का शुभ संकेत है। नालंदा का मार्गदर्शक सिद्धांत ऋग्वेद के इस शाश्वत मंत्र में निहित है:
“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः”
अर्थात्—सभी दिशाओं से हमारे पास शुभ एवं श्रेष्ठ विचार आएं। सभी स्रोतों से अच्छे विचार ग्रहण करना केवल एक आदर्श नहीं था, बल्कि एक जीवंत परंपरा थी। नालंदा ने विविध विचारधाराओं का स्वागत किया और वाद-विवाद-संवाद को प्रोत्साहित किया। यहां ज्ञान को कभी भी अलग करके नहीं देखा गया; इसे नैतिकता, समाज और मानवता के व्यापक कल्याण से जोड़ा गया। यह आदर्श आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। आज जब विश्व अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब करुणा पर आधारित स्वतंत्र और विवेचनापूर्ण चिंतन की आवश्यकता पहले से अधिक है।
मुझे विश्वास है कि नालंदा विश्वविद्यालय एशिया और विश्व में एक अग्रणी शिक्षण संस्थान के रूप में उभरेगा। यह न केवल अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता बल्कि अपने मूल्यों के लिए भी विशिष्ट पहचान बनाएगा। मुझे यह देखकर प्रसन्नता होती है कि विश्वविद्यालय interdisciplinary learning, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और स्थानीय समुदायों के साथ सहभागिता के माध्यम से इस दिशा में निरंतर अग्रसर है।
किसी भी विश्वविद्यालय के लिए अपने स्थानीय परिवेश से जुड़े रहना भी आवश्यक होता है। उसकी प्रगति का लाभ उस स्थानीय समाज को भी मिलना चाहिए, जहां वह स्थापित है। मैं विश्वविद्यालय की ‘सहभागिता संवाद’ पहल की सराहना करती हूं, जिसके माध्यम से स्थानीय समुदायों और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के साथ जुड़ने के सार्थक प्रयास किए जा रहे हैं।
देवियो और सज्जनो,
आज भारत अपनी शैक्षिक यात्रा के एक महत्वपूर्ण चरण पर पहुंच गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को अपनाए जाने के पांच वर्षों के दौरान समग्र, बहु-विषयक और मूल्य- आधारित शिक्षा पर नए सिरे से जोर दिया गया है। सीखने-समझने की हमारी प्राचीन परंपराएं कभी भी किन्हीं निश्चित सीमाओं में परिसीमित नहीं रहीं। हमारी परंपराओं में पूछताछ, संवाद और तार्किक मिलाप को प्रोत्साहित किया जाता था। नालंदा को एक बार फिर इस भाव और परंपरा को मूर्त रूप देना चाहिए और विभिन्न विषयों और संस्कृतियों की ज्ञान पद्धतियों को एक साथ लाना चाहिए। मुझे यह देखकर प्रसन्नता हो रही है कि यह विश्वविद्यालय संधारणीय विकास के लिए प्रतिबद्ध है और यह नेट ज़ीरो परिसर बनने की दिशा में अग्रसर है। ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन से जुड़ी गंभीर चुनौतियां सामने आ रही हैं, उच्च शिक्षण संस्थानों को इनका सामना करने का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। पारिस्थितिकी, पर्यावरण और संधारणीय विकास पर केंद्रित शैक्षिक कार्यक्रम आज समय की मांग भी हैं और आवश्यकता भी हैं। मुझे विश्वास है कि यहां किए जाने वाले शोध कार्यों से इन चुनौतियों के समाधान में सार्थक योगदान मिलेगा। मैं बौद्ध अध्ययन के बारे में कुछ बात कहना चाहूंगी, क्योंकि मेरा मानना है कि यह भारत और विशेष रूप से नालंदा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पहले, लगभग आठ शताब्दियों तक प्राचीन नालंदा एशिया में बौद्ध विद्वत्ता का बौद्धिक केंद्र रहा है। एशिया महादेश के विद्वान यहां अध्ययन-ज्ञानार्जन करने, वाद-विवाद करने और धम्म की गहरी समझ विकसित करने के लिए आते थे। बौद्ध चिंतन के इतिहास के कुछ उच्च कोटि के विद्वानों ने इस भूमि पर रहकर कार्य किया है। यह असाधारण महत्व की एक विरासत है।
मुझे यह जानकर खुशी हो रही है कि यह विश्वविद्यालय इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कृत संकल्प है। भारत का बौद्ध दर्शन और परंपरा से गहरा और जीवंत संबंध है। इस संबंध को गंभीरता से और भारत की शास्त्रीय ज्ञान परंपराओं की व्यापक समझ के साथ सिंचित किया जाना चाहिए। बौद्ध वाङ्मय को, पूरे एशिया में इसकी विविध अभिव्यक्तियों से तालमेल बनाते हुए भारत की सभ्यतागत जड़ों से जोड़ कर रखना चाहिए।
मुझे विश्वास है कि नालंदा विश्वविद्यालय बौद्ध अध्ययन के एक अग्रणी वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सकता है। मैं चाहूंगी कि विश्वविद्यालय इस क्षेत्र में दृढ़ संकल्प, गहराई और खुले मन से जुटे। ऐसा करके नालंदा विश्वविद्यालय एक बार फिर वही पुरानी भूमिका निभा सकता है जो वह सदियों पूर्व निभाता था। नालंदा विश्वविद्यालय विश्व के साथ भारत के जुड़ाव के एक और महत्वपूर्ण आयाम को भी निरूपित करता है। और वह है-शैक्षिक कूटनीति। इसके भागीदार देशों की भागीदारी, विशेष रूप से एशिया में, साझा सांस्कृतिक और बौद्धिक संबंधों को दर्शाती है।
प्रिय विद्यार्थियो,
आज का दिन आपके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। उपाधि केवल अकादमिक उपलब्धि की ही पहचान नहीं है। यह एक जिम्मेदारी भी है। आप में से प्रत्येक पर यह जिम्मेदारी है कि आप अपने ज्ञान का उपयोग सबकी भलाई के लिए करें। उपाधि प्राप्त करने वाली छात्राओं की उपलब्धियों को जानकर मुझे विशेष रूप से प्रसन्नता हो रही है। आपकी सफलता कई अन्य लोगों को प्रेरणा देगी। आप इस विश्वविद्यालय से दो चीजें लेकर जा रहे हैं: एक उपाधि और दूसरी यहां की विरासत। उपाधि केवल आपकी है किन्तु विरासत पूरी मानवता के लिए है। जैसा कि धम्मपद हमें स्मरण कराता है:
तुम्हेहि किच्चं आतप्पं, अक्खातारो तथागता ।
“प्रयास आपको स्वयं करना होगा; तथागत केवल मार्ग दिखा सकते हैं।”
आप यहां के प्रथम उपाधिधारकों में शामिल हैं। इस विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा इसके भवनों अथवा रैंकिंग से नहीं बनेगी। बल्कि इसकी प्रतिष्ठा आपके करियर और जीवन में आपके द्वारा किए जाने वाले कार्यों और आपके आचरण से बनेगी।
आज मैं आपके साथ तीन विचार साझा करना चाहती हूं:
पहला, जिज्ञासु बनें। प्रश्न पूछा करें और जीवन में सीखने के लिए सदैव तत्पर बने रहें। दूसरा, ज्ञान को सेवा से जोड़कर चलें। अपनी शिक्षा का उपयोग दूसरों के उत्थान के लिए करें।
तीसरा, अपने शिक्षण संस्थान से जुड़े रहें। आप इस संस्थान के राजदूत हैं। नालंदा विश्वविद्यालय समावेशी ज्ञान और प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता का प्रतीक है। इसे भविष्य में भी इन सिद्धांतों से प्रेरित होना चाहिए।
भारत सरकार इस संस्थान के विकास में सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है। कहा जाता है कि प्राचीन नालंदा के पुस्तकालय में लाखों पांडुलिपियों का संग्रह था। उस ऊंचे मापदंड को आधार मानते हुए, आज हम यहां जो कार्य करेंगे वही हमारी चिरस्थायी धरोहर बनेंगे। वर्ष 2047 तक भारत के विकसित राष्ट्र बनने की यात्रा में नालंदा विश्वविद्यालय जैसे संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
मैं उपाधि प्राप्त करने वाले सभी विद्यार्थियों को उनके भावी प्रयासों के लिए हार्दिक शुभकामनाएं देती हूं।
धन्यवाद।
जय हिंद!
जय भारत!
