भारत की माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का 66वें राष्‍ट्रीय रक्षा महाविद्यालय पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों से मुलाकात के अवसर पर संबोधन

राष्ट्रपति भवन : 13.10.2026

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भारत की माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का 66वें राष्‍ट्रीय रक्षा महाविद्यालय पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों से मुलाकात के अवसर  पर संबोधन

मुझे भारतीय सशस्त्र बलों, सिविल सेवाओं के वरिष्ठ अधिकारियों और विदेशी मित्र देशों के अधिकारियों की इस सभा को संबोधित करते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है। मैं, आप सभी का हार्दिक स्वागत करती हूं।

आज सुरक्षा और प्रौद्योगिकी के परिदृश्य में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं, जिससे नई और जटिल चुनौतियां उत्‍पन्‍न हो रही हैं। इन परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए बेहतर तैयारी, रणनीतिक दूरदृष्टि और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता आवश्यकता बन चुकी है। ऐसे में तेजी से निर्णय लेने की व्यवस्था भी अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है क्योंकि आधुनिक युद्ध की तकनीकें पारंपरिक क्षेत्रों के अलावा साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और जैव प्रौद्योगिकी जैसे नए क्षेत्रों तक विस्तृत हो गई हैं।

मुझे बताया गया है कि राष्‍ट्रीय रक्षा महाविद्यालय का यह पाठ्यक्रम भारत और मित्र देशों के सिविल सेवा और रक्षा सेवाओं के वरिष्ठ अधिकारियों को राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक नीति के क्षेत्र में उच्चतर दायित्वों के निर्वहन के लिए तैयार करता है। मुझे विश्वास है कि इस कोर्स के दौरान हुए गहन विचार- विमर्श से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर आपका दृष्टिकोण व्यापक हुआ होगा। ऐसे पाठ्यक्रम उच्च स्तर पर होने वाले संवाद के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय संबंधों को व्यावहारिक एवं सार्थक समन्वय स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

आज, राष्ट्रीय सुरक्षा का दायरा केवल सैन्य क्षमताओं तक सीमित नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिक संस्थानों और सशस्त्र बलों के बीच निकट सहयोग आवश्यक है ताकि नवाचारों को व्यावहारिक समाधानों में परिवर्तित किया जा सके। हाल के संघर्षों ने ऐसी कम लागत वाली प्रौद्योगिकियों के महत्व को उजागर किया है, जो उन्नत रक्षा प्रणालियों की पूरक हों और उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्‍तम उपयोग सुनिश्चित करें। 

इस संदर्भ में, नवाचार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संबंध को सुदृढ़ करने में सरकारी पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत सरकार की अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना स्वदेशी अनुसंधान और प्रौद्योगिकीय विकास को बढ़ावा देने के लिए चलाई गई एक समन्वित पहल है। यह पहल न केवल डीप- टेक स्टार्टअप्स को बढ़ावा देती है बल्कि रणनीतिक अपेक्षाओं, आर्थिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकियों के विकास को भी प्रोत्साहित करती है।

प्रिय अधिकारियो,

भारत की तरह अनेक देश अब यह जान चुके हैं कि भविष्य के राष्ट्रीय सुरक्षा परिदृश्य में क्वांटम प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कन्वर्जेंस को देखा जाएगा। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अंतरिक्ष-आधारित क्षमताएं होना भी अब जरूरी हो गया है। विज्ञान, राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों के विभिन्न क्षेत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। सामरिक दृष्टि से निर्णय लेने की प्रक्रिया में इस प्रौद्योगिकी का प्रयोग बढ़ता जाएगा। हालांकि, निर्णय लेने का कार्य सिर्फ कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर अनन्‍य रूप से निर्भर रहकर नहीं किया जा सकता। इसका उपयोग करते समय संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक होगा। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि आपके पाठ्यक्रम- मॉड्यूल्स और विभिन्न विषयों पर आपका जो इंटरऐक्शन हुआ है वे उभर कर सामने आने वाले सरोकारों के विभिन्न आयामों का निराकरण करते हैं।

प्रिय अधिकारियो,

भारत के बहुत से प्राचीन ग्रंथों में सुरक्षा व्यवस्था तंत्र और शासक के कर्तव्यों के बारे में विस्तार से बताया गया है। वाल्मीकि रामायण और महाभारत में ऐसे अनेक उपायों का विस्तार से वर्णन किया गया है जो एक शासक द्वारा राज्य की सुरक्षा के लिए किए जाने चाहिए। ऐसा ही एक वर्णन रामायण में आता है जब ​​भगवान राम के वनवास के प्रारंभिक दिनों में भरत चित्रकूट में अपने बड़े भ्राता से मिलने जाते हैं और श्री राम उनसे राज कार्य को चलाने के तरीके से जुड़े बहुत से प्रश्न पूछते हैं। इन प्रश्नों में शासन-व्यवस्था के अनेक महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं। सैन्य तैयारी के अलावा, उन्होंने रणनीतिक निर्णय लेने और आसूचना एकत्र करने की रणनीतियों के बारे में प्रश्न पूछे हैं। साथ ही वे राजकोषीय प्रबंधन, न्याय, लोक-कल्याण और विदेशी राष्ट्रों के साथ संबंधों के बारे में भी जानकारी लेते हैं।

इसी तरह, महाभारत के शांति पर्व में युधिष्ठिर भीष्म पितामह से पूछते हैं कि एक शासक कैसे अपना शासन चलाए। भीष्म पितामह शासन-कला और एक कुशल शासक के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से जुड़े अनेक पहलुओं के बारे में विस्तार से बताते हैं। वे राज्य की रक्षा करने और दुश्मनों को परास्त करने के लिए रणनीतियां बनाने के साथ-साथ गुप्तचर्या के प्रबंधन के बारे में भी बताते हैं।

भीष्म का यह मार्गदर्शन सुरक्षा तक ही सीमित नहीं है। उन्होंने सामाजिक एकता के साथ सुरक्षा पर बल दिया है। न्यायपूर्ण शासन चलाने के सिद्धांत के तहत, भीष्म पितामाह ने आर्थिक संसाधनों, कूटनीति, रक्षा और आंतरिक शांति को इसके अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार किया है।

प्रिय अधिकारियो,

आर्थिक सुदृढ़ता राष्ट्रीय सुरक्षा के ढांचे का एक अभिन्न अंग है। भारतीय अर्थव्यवस्था ने बाह्य कारकों से उत्पन्न व्यवधानों को झेल कर उनसे उबरने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है। भारत ने यह उपलब्धि अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता से समझौता किए बिना हासिल की है।

मुझे विश्वास है कि इस पाठ्यक्रम के परिणामस्वरूप आपकी समझ गहरी हुई होगी। इससे आपको रणनीतिक सोच के साथ नेतृत्वपरक जिम्मेदारियों के क्षेत्रों में कार्य करने में मदद मिलेगी। यहां आपने जो अनुभव अर्जित किया है उससे आप अपने-अपने देश के समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने में योगदान दे पाएंगे।

मैं, आप सब के सफल भविष्य की कामना करती हूं और आशा करती हूं कि आप निरंतर प्रगति करते हुए कुशल अधिकारी बनेंगे।

धन्यवाद!
जय हिंद!
जय भारत!

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