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Speeches

भारत के राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविन्द जी का दिव्यांगों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार 2017 प्रदान करने के अवसर पर संबोधन

विज्ञान भवन : 03.12.2017
भारत के राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविन्द जी का दिव्यांगों के लिए राष्ट्रीय पुरस्क
1. अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस के अवसर पर दिव्यांग-जनों को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित करना एक खुशी का अवसर है। भारत सरकार के सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय द्वारा आरंभ किया गया यह पुरस्कार एक सराहनीय कदम है। मुझे प्रसन्नता है कि, यह पुरस्कार 14 विभिन्न श्रेणियों के उन व्यक्तियों, संगठनों और राज्य विशेष को दिए जा रहे हैं, जिन्होंने इस क्षेत्र में असाधारण कार्य किये हैं।

2. दिव्यांगता मानव जीवन की एक "ऐसी अवस्था” है जिसका हममें से किसी को भी अपने जीवनकाल में कभी भी सामना करना पड़ सकता है। जैसा कि सर्वविदित है, केंद्र व राज्य सरकारें सूचना और प्रौद्योगिकी के माध्यम से, दिव्यांग-जनों के दैनिक जीवन की जरुरत के अनुसार नई सुविधाएं प्रदान कर रही हैं। इस कड़ी में, सार्वजनिक भवनों, पर्यटक स्थलों एवं परिवहन को दिव्यांग-जनों के लिए सुगम्य बनाना एक अत्यंत प्रसंसनीय पहल है। यह खुशी की बात है कि यह सुविधाएं, दिव्यांग-जनों के साथ-साथ वृद्ध नागरिकों, गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने में भी योगदान देती है।

3. देश का भविष्य, देश के नागरिकों के सशक्तीकरण पर निर्भर है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ की हमारी धारणा और परिकल्पना में, हमें इस बात के लिए प्रतिबद्ध होना होगा कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उसके विकास के लिए समान अवसर प्राप्त हों। इस लक्ष्य के लिए, हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जो पूरी तरह संवेदनशील हो और जहां समरसता का प्रवाह हो। एक ऐसा समाज, जहां प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को सशक्त महसूस कर सके। एक ऐसा समाज जहां किसी एक का दर्द या पीड़ा, सबको समान रूप से महसूस हो। यह संवेदनशीलता एवं अपनापन, देश और समाज को और मजबूत बनायेगा। सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों द्वारा दिव्यांग-जनों को जो आधुनिक उपकरण दिए जाते हैं वे न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ाते हैं बल्कि इससे समाज में एक सकारात्मक जागरूकता फैलती है। मुझे बताया गया है कि केंद्र सरकार द्वारा, इस योजना के अंतर्गत, पिछले साढ़े तीन वर्षों में लगभग 8 लाख दिव्यांग-जनों की मदद हुई है।
भाइयो और बहनो,

4. किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन में आर्थिक रूप से सक्षम होना, उसके जीवन को बेहतर बनाता है। इसलिए, दिव्यांग-जनों के लिए "रोजगार सृजन” एक महत्वपूर्ण कदम है। और इस दिशा में दिव्यांग भाई-बहनों के लिए, हमारी शासकीय प्रणाली में आरक्षण की आदर्श व्यवस्था है। मुझे खुशी है कि, दिव्यांगों के लिए रिक्त पड़े पदों पर तेजी से नियुक्तियां की जा रही हैं। यह ‘नये भारत की नयी सोच’ को दर्शाता है। आज दिव्यांग कलेक्टर, इंजीनियर, डिप्लोमेट्स, डॉक्टर और वैज्ञानिक बनकर देश के विकास में अपना अहम योगदान दे रहे हैं। इस दिशा में भारत सरकार द्वारा कौशल विकास की राष्ट्रीय कार्य योजना के अंतर्गत 2022 तक, 25 लाख दिव्यांग-जनों को रोजगार प्रदान करने की योजना, एक प्रभावी कदम सिद्ध होगी। मैं सभी सरकारी और निजी उद्यमों से यह अपेक्षा करता हूं कि वे इस कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

5. मुझे लगता है कि हमें एक और पहलू पर नजर डालनी चाहिए। यदि हमारा ध्यान शिशुकाल में ही सावधानियों और उचित इलाज पर हो और सही समय पर टीकाकरण, सही पोषण, स्वच्छता और मातृत्व देखभाल पर ध्यान दिया जाए तो दिव्यांगता में कमी लाना संभव है।

6. जैसा कि हम सभी जानते हैं, अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य है कि दिव्यांगता संबंधी मुद्दों की लोगों में समझ बढ़े एवं दिव्यांग-जनों को सशक्त करने के ठोस प्रयास किए जाएं, ताकि वे गरिमा के साथ अपना जीवन व्यतीत कर सकें और जीवन के बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक, हर क्षेत्र में उनकी सहभागिता सुनिश्चित हो। हमें विशाल ह्रदय के साथ, अपने दिव्यांग भाई-बहनों के उत्थान के लिए, आगे आना होगा। दिव्यांग-जन भी समाज के महत्वपूर्ण अंग हैं। उनके विकास के बिना समाज का विकास अधूरा है।

प्यारे भाइयो और बहनो,
7. हमारा संविधान, दिव्यांग-जनों सहित सभी देश-वासियों को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा की गारंटी देता है, सरकार ने दिव्यांग-जनों के सशक्तीकरण एवं राष्ट्र की मुख्यधारा में उनके समावेशन के लिए, कानून बनाये हैं। भारत सरकार ने, दिव्यांग-जनों के अधिकारों पर "दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016” पारित किया है। यह नया अधिनियम, दिव्यांग-जनों को समावेशी और सक्षम बनाने वाले वातावरण के लक्ष्य के साथ उन्हें और अधिक अधिकार प्रदान करता है। दिव्यांग-जनों की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए एक संवेदनशील राष्ट्र ने दिव्यांगताओं की श्रेणी में भी बढ़ोतरी करते हुए इसे 7 श्रेणी से बढ़ाकर 21 कर दिया है। सरकार का यह फैसला अत्यंत सराहनीय है। मुझे विश्वास है कि इस पहल से ज्यादा से ज्यादा दिव्यांग-जनों का जीवन बेहतर एवं सम्मान-जनक होगा।

8. सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में दिव्यांग छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं की शुरुआत की है। इसके अलावा, दिव्यांग-जनों की सुविधा के अनुसार उनके लिए अध्ययन सामग्री, शैक्षिक प्रौद्योगिकी तथा उपकरण उपलब्ध कराये जा रहे हैं। मैं चाहूंगा कि दिव्यांग छात्रों की जरूरतों का पता लगाने के लिए प्रत्येक शिक्षक को विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, जिससे अध्यापक गण इन बच्चों की जरूरतों को समझ सकें और हर दिव्यांग बच्चा स्वयं को और भी सक्षम बना सके।

9. यह हर्ष का विषय है कि लगातार दूसरे वर्ष, सरकार ने राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कुरुक्षेत्र के सहयोग से बौद्धिक, शारीरिक, श्रवण और दृष्टि संबंधी दिव्यांगताओं वाले युवाओं के बीच एक राष्ट्रीय आई. टी. प्रतियोगिता आयोजित की है। यह अत्यंत खुशी की बात है कि इसमें नामित प्रतिभागियों ने वियतनाम में आयोजित ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता’ में व्यक्तिगत श्रेणी में, भारत को तीन पदक दिलाए। मैं राज्य स्तर पर युवा दिव्यांग-जनों के बीच आई. टी. कौशल को बढ़ावा देने के लिए, अन्य राज्यों से भी इस प्रकार की प्रतियोगिताएं आयोजित करने की अपेक्षा करता हूं।

10. ब्रिटेन के निवासी स्टीफन हॉकिन्स का नाम दिव्यांगता के क्षेत्र में एक प्रचलित नाम है जो अपनी शारीरिक अक्षमता के बावजूद आज विश्व के सबसे बड़े वैज्ञानिक हैं। हॉकिन्स के दिमाग को छोड़कर, उनके शरीर का कोई भी अंग काम नहीं कर रहा था परन्तु अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति तथा टेक्नोलोजी की मदद से उन्होंने अपनी क्षमतानुसार विज्ञान के क्षेत्र में भरपूर योगदान दिया। हॉकिन्स ने एक बार बताया कि उनकी बीमारी ने ही उन्हें वैज्ञानिक बनाने में सबसे बड़ी भूमिका अदा की है। बीमारी से पहले, वे अपनी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे; लेकिन बीमारी के दौरान उन्हें लगने लगा कि वे अब जिंदा नहीं रहने जा रहे हैं। जिसके बाद उन्होंने अपना सारा ध्यान रिसर्च पर लगा दिया।

11. आपने, अष्टावक्र ऋषि के बारे में सुना होगा। अष्टावक्र, प्राचीन काल के एक प्रसिद्ध और तेजस्वी मुनि थे। उन्हें महान् ज्ञानियों में गिना जाता है। कहते हैं कि, अष्टावक्र का शरीर आठ स्थानों से टेढ़ा था। इसलिए उन्हें लोग अष्टावक्र के नाम से सम्बोधित करने लगे। एक कथा के अनुसार ऋषि अष्टावक्र जब मिथिला नरेश राजा जनक के दरबार में पहुंचे तो उनके शारीरिक विकृति को देखकर वहां दरबार में उपस्थित दूसरे विद्वानों ने उनका उपहास किया। परन्तु, मिथिला नरेश के राजपुरोहित को अष्टावक्र ने शास्त्रार्थ में हरा दिया। बाद में राजा जनक ने भी ऋषि अष्टावक्र से ज्ञान का उपदेश लिया। अष्टावक्र ने अपने ज्ञान के बल पर संपूर्ण मानव जगत को एक बहुमूल्य जीवन दर्शन दिया। अष्टावक्र ऋषि के दो महत्वपूर्ण ग्रन्थ ‘अष्टावक्र गीता’ और 'अष्टावक्र संहिता' हैं। अष्टावक्र गीता "अद्वैत वेदान्त” का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है।

12. किसी दिव्यांग का मूल्यांकन उसकी शारीरिक क्षमता से नहीं, बल्कि उसकी सोच, उसकी बुद्धिमत्ता, उसके विवेक और उसके साहस से होनी चाहिए। हमारा यही दृष्टिकोण, दिव्यांगों की वास्तविक प्रतिभा को सामने लाने में सहायक सिद्ध होगा। अष्टावक्र ऋषि या स्टीफेन हाकिन्स का जीवन, हमें एक महान सन्देश देता है कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति की "कमज़ोरी नहीं बल्कि उसकी विशेषता” हो सकती है। इसलिए व्यक्ति के शारीरिक सौंदर्य या उसकी आकर्षक शारीरिक बनावट या रंग-रूप को महत्व न देकर उसके ज्ञान, विवेक, हिम्मत और उसके कौशल के आधार पर उसकी महानता देखनी चाहिए।

13. दिव्यांग-जनों के अदम्य साहस के दुनियां में कई उदाहरण हैं। जन्म से हीं दिव्यांग रॉबर्ट हंसेल ने, व्हील-चेयर प्रतियोगिता में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। उनके प्रयासों से ओसवेगो (न्यूयार्क) की सरकार ने प्रत्येक वर्ष 1 से 7 अक्टूबर को, दिव्यांग-जनों को समर्पित किया है। जिसे Beyond Limitations week कहा जाता है। ‘रॉबर्ट हंसेल’ ने बहुत सुन्दर कहा, ‘मैं विकलांग हूं, यह सही है, लेकिन इसका मतलब सिर्फ यह है कि मुझे आगे बढ़ने के लिए आपसे थोड़ा अलग रास्ता लेना पड़ेगा।’

14. चेन्नई की टिफ़नी बराड़, हम सभी के लिए एक उदाहरण हैं, वे बचपन से सौ प्रतिशत दिव्यांग होने के बावजूद भी पढ़ाई के साथ-साथ पैरा-ग्लाइडिंग, स्काई डाइविंग, साइकलिंग, रस्सी चढ़ाई और अन्य साहसिक खेलों में भाग लेती रही हैं। टिफ़नी बराड़, बचपन में ही कई भारतीय भाषाओं की जानकार बन गईं। अब वे विभिन्न सामाजिक कार्यों से जुड़कर सेवा कार्य भी कर रही हैं। टिफ़नी अब दुनियां भर में दिव्यांग-जनों के लिए "विशेष शिक्षा पद्धति” पर कार्य कर रही हैं। भारत की यह साहसिक बेटी, आज दुनियां के लिए एक रोल मॉडल बन गई है।

15. पैरा ओलंपिक में पदक विजेता देवेन्द्र सिंह झांझरिया, के. एम. मैरय्यापन, दीपा मलिक व वरुण मलिक दूसरे दिव्यांग-जनों के लिए आदर्श हैं। भारतीय दिव्यांग क्रिकेट टीम के विश्व स्तर पर बेहतर प्रदर्शन से हम सभी गौरवान्वित हुए हैं। अपने सपनों को साकार करने के लिए, इन सभी के अदम्य साहस व भावना की मैं सराहना करता हूँ।

16. उत्तर प्रदेश की अरुणिमा सिन्हा सभी दिव्यांग-जनों के लिए आदर्श हैं। एक अत्यंत मार्मिक ट्रेन दुर्घटना में अरुणिमा को अपना एक पैर गवांना पड़ा, परन्तु जीवन में उन्होंने हार नहीं मानी। गंभीर दुर्घटना से लड़कर, अदम्य साहस के साथ "अरुणिमा सिन्हा” ने एवरेस्ट समेत कई पर्वत श्रेणियों की ऊंची चोटियों को भी फतह किया है। अरुणिमा सिन्हा ने अपने दृढ़-विश्वास से सबके लिए एक मिसाल कायम की है। हमारे संवेदनशील राष्ट्र ने उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया।

17. इन रोल मॉडल्स ने, गंभीर दिव्यांगताओं के बावजूद हमारे देश का मान-सम्मान पूरी दुनियां में बढ़ाया है। मैं एक बार फिर राष्ट्रीय पुरस्कार विजेताओं को बधाई देते हुए उनके भावी जीवन की सफलता के लिए अपनी शुभकामनाएं देता हूं। मुझे विश्वास है कि इनसे प्रेरणा लेकर, अन्य दिव्यांग-जन जीवन में और ऊंचाई प्राप्त करने के लिए, साहस के साथ प्रयत्न करेंगे। साथ ही साथ मेरे देशवासी, दिव्यांग-जनों के जीवन को और बेहतर बनाने के लिए, संवेदनशीलता के साथ एक समावेशी नये भारत का निर्माण करेंगे।

धन्यवाद,

जय हिन्द।

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