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राष्ट्रपति भवन का अवलोकन

राष्ट्रपति भवन की भव्यता बहुआयामी है। यह एक विशाल भवन है और इसका वास्तुशिल्प विस्मयकारी है। इससे कहीं अधिक, इसका लोकतंत्र के इतिहास में गौरवमय स्थान है क्योंकि यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राष्ट्रपति का निवास स्थल है। आकार, विशालता तथा इसकी भव्यता के लिहाज से, दुनिया के कुछ ही राष्ट्राध्यक्षों के सरकारी आवासीय परिसर राष्ट्रपति भवन की बराबरी कर पाएंगे।

मौजूदा राष्ट्रपति भवन पहले ब्रिटिश वायसराय का निवास स्थान था। इसके वास्तुकार एडविन लैंडसीयर लुट्येन्स थे। ब्रिटिश वायसराय के लिए नई दिल्ली में निवास स्थान निर्माण करने का निर्णय तब लिया गया था जब दिल्ली दरबार में 1911 में यह तय किया गया था कि भारत की राजधानी को उसी वर्ष कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित किया जाएगा। इस इमारत का निर्माण भारत में ब्रिटिश हुकूमत के स्थायित्व पर मोहर लगाने के लिए किया गया था। एक आलोचक के शब्दों में इस इमारत से एक चिरस्थाई दरबार का अहसास होता था। यह इमारत तथा इसके परिवेश को यह माना जाता था कि यह ‘पत्थरों से निर्मित साम्राज्य’ है जो कि ‘शाही प्रभुत्व का उपभोग करता था’ तथा यह, ‘‘ऐसे निरपेक्ष आभिजात्य वर्ग का निवास था जिसका शासन ऊपर से थोपा गया था।’’ इस ‘पत्थरों से निर्मित साम्राज्य’ तथा चिरस्थायी दरबार को 26 जनवरी, 1950 को उस समय लोकतंत्र की स्थायी संस्था के रूप में परिवर्तित कर दिया गया था जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने तथा उन्होंने भारत के संविधान की संरक्षा, सुरक्षा तथा रक्षा के लिए इस भवन में निवास करना शुरू किया। इसी दिन से इस भवन का नाम बदलकर राष्ट्रपति भवन अर्थात राष्ट्रपति का निवास रखा गया।

मुख्य वास्तुविद, एडविन लुट्येन्स तथा मुख्य इंजीनियर, ह्यूज कीलिंग के अलावा बहुत से भारतीय ठेकेदार इस इमारत के निर्माण से जुड़े थे।

इस भवन के लिए 400000 पौंड की राशि मंजूर की गई थी। परंतु इस इमारत के निर्माण में 17 साल का लम्बा समय लगा, जिससे इसकी लागत बढ़कर 877,136 पौंड (उस समय 12.8 मिलियन) हो गयी। इस इमारत के अलावा, मुगल गार्डन तथा कर्मचारियों के आवास पर आया वास्तविक खर्च 14 मिलियन था। कहा जाता है कि एडविन लुट्येन्स ने कहा था कि इस इमारत के निर्माण में लगी धनराशि दो युद्ध पोतों के निर्माण में लगने वाली धनराशि से कम थी।

यह एक रोचक तथ्य है कि जिस भवन को पूरा करने की समय-सीमा चार वर्ष थी, उसे बनने में 17 वर्ष लगे और इसके निर्मित होने के अट्ठारहवें वर्ष भारत आजाद हो गया।

इस विशाल भवन की चार मंजिलें हैं और इसमें 340 कमरे हैं। 200000 वर्गफीट के निर्मित स्थल वाले इस भवन के निर्माण में 700 मिलियन ईंटों तथा तीन मिलियन क्यूबिक फीट पत्थर का प्रयोग किया गया था। इस इमारत के निर्माण में इस्पात का अत्यल्प प्रयोग हुआ है।

राष्ट्रपति भवन का सबसे प्रमुख तथा विशिष्ट पहलू इसका गुम्बद है जो कि इसके ढांचे के ऊपर प्रमुखता से स्थापित है। यह काफी दूर से दिखाई देता है और दिल्ली के बीचों-बीच स्थित एक वृत्ताकार आधार पर टिकी हुई चित्ताकर्षक गोलाकार छत है। हालांकि लुट्येन्स ने जाहिरी तौर पर इस गुंबद का डिजायन रोम के पैंथियन से लेने की बात स्वीकार की है परंतु जानकार विश्लेषकों का यह दृढ़ मत है कि इस गुंबद का ढांचा सांची के महान स्तूप की बनावट पर तैयार किया गया था। इस गुंबद में भारतीय वास्तुशिल्प की प्रमुखता इस तथ्य से स्पष्ट है कि यह सांची मूल के रेलिंग से घिरा हुआ है। वास्तव में, पूरा राष्ट्रपति भवन बौद्ध रेलिंगों, छज्जों, छतरियों तथा जालियों जैसे भारतीय वास्तुशिल्प संबंधी बनावटों का मूर्त रूप है।

छज्जे पत्थर के ऐसे स्लैब होते हैं जिन्हें भवन की छत के नीचे लगाया जाता है और उनका डिजाइन इस तरह बनाया जाता है जिससे धूप खिड़कियों पर न पड़े तथा बरसात के मौसम में दीवारें पानी से बच सकें। छतरियां भवन के छतों पर लगी होती हैं तथा वे ऊंची होने के कारण क्षितिज पर अलग दिखाई देती हैं। छज्जों और छतरियों की तरह ही जालियां भी विशिष्ट भारतीय डिजाइन की हैं और इनसे राष्ट्रपति भवन के वास्तुशिल्प में चार-चांद लग जाते हैं। जालियां पत्थरों के ऐसे स्लैब हैं जिनमें बहुत से छेद बनाए गए हैं तथा उन पर बारीकी से फूल तथा ज्यामितीय पैटर्न बनाए गए हैं। लुट्येन्स ने बहुत ही सावधानी से छज्जों, छतरियों और जालियों का प्रयोग किया और उन्हें सटीक जगहों पर लगाकर इन डिजाइनों की उपयोगिता का कुशलता से प्रयोग किया। राष्ट्रपति भवन में लगी हुई कुछ जालियों में, इनकी सुंदरता और उपयोगिता बढ़ाने के लिए लुट्येन्स ने यूरोपीय शैली का भी मिश्रण किया।

राष्ट्रपति भवन की एक अन्य विशेषता इसके खंभों में भारतीय मंदिरों की घंटियों का प्रयोग है। यह सर्वविदित है कि मंदिरों की घंटियां हमारी सामासिक संस्कृति, खासकर हिंदू, बौद्ध तथा जैन परंपराओं का अभिन्न अंग है। इन घंटियों का हेलेनिक शैली के वास्तुशिल्प के साथ मिश्रण, वास्तव में भारतीय और यूरोपीय डिजाइनों के सम्मिश्रण का एक बेहतरीन उदाहरण है। खास बात यह है कि इस तरह की घंटियां नार्थ ब्लॉक, साउथ ब्लाक तथा संसद भवन में मौजूद नहीं हैं। यह उल्लेख करना रोचक होगा कि राष्ट्रपति भवन के खंभों में इस तरह की घंटियों के प्रयोग का विचार कर्नाटक के मुदाबिदरी नामक स्थान पर स्थित एक जैन मंदिर से प्राप्त हुआ।

जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने भारत के प्रथम गवर्नर जनरल के तौर पर पद ग्रहण किया और वे इस भवन में आकर रहने लगे, वे इसके कुछ ही कमरों में रहना पसंद करते थे जो अब राष्ट्रपति का फैमिली विंग है। तत्कालीन वायसराय के आवास को अतिथि विंग में बदल दिया गया था जहां दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्ष भारत में अपने प्रवास के दौरान ठहरते हैं।

भारत के लोगों की शक्ति तथा प्राधिकार, जो कि इस गणतंत्र में व्याप्त है, का प्रतिनिधित्व इस देश के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है, जिनका सरकारी आवास राष्ट्रपति भवन है तथा जिस भवन का वास्तुशिल्प दुनिया भर के समर्पित वास्तुविदों और आम आदमी, सभी को मंत्रमुग्ध कर देता है।

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