भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का बस्तर दशहरा के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में संबोधन
जगदलपुर : 23.10.2026
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मैं इस क्षेत्र की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी को प्रणाम करती हूँ। यह मेरा सौभाग्य है कि माँ दंतेश्वरी के मंदिर जाकर दर्शन-पूजन करने का मुझे आज अवसर प्राप्त हुआ। उनके साथ ही इस क्षेत्र के अन्य जनजातीय देवी- देवताओं को भी मैं प्रणाम करती हूँ।
छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक गौरव और सामूहिक आस्था के जीवंत प्रतीक इस उत्सव में आकर मुझे विशेष प्रसन्नता हो रही है। प्रदेश के जनजातीय समाज में उत्सवों का महत्व जीवन के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। ढाई महीने चलने वाले बस्तर दशहरा उत्सव में समूचे समाज की जिस तरह से सहभागिता होती है, वह असाधारण है।
समाज के विभिन्न वर्गों को आत्मीयता से जोड़ने वाले अनेक अनुष्ठान बस्तर दशहरे को विशेष आकर्षक बनाते हैं।
आज यहाँ आने से पहले माँझी बंधुओं से मैंने मुलाक़ात की। उन्होंने मुझे मुरिया दरबार की परंपरा के बारे में बताया। ये व्यवस्थाएं जमीन से जुड़ी लोकतान्त्रिक पद्धतियों के अच्छे उदाहरण हैं। मुरिया दरबार जैसी प्रक्रिया से प्राप्त होने वाले समाधान सबकी खुशहाली का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इससे हमारे लोकतंत्र का गौरव बढ़ता है।
बस्तर के एक प्रतिनिधिमंडल से दो माह पहले राष्ट्रपति भवन में मेरी भेंट हुई थी। इसमें बस्तर पंडुम के विजेतागण तथा बस्तर के परगना माँझी और चालकी भी शामिल थे। बस्तर पंडुम जैसे आयोजन युवाओं को अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत से पुनः जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।
देवियो और सज्जनो,
छत्तीसगढ़ राज्य लंबे समय तक नक्सलवाद की समस्या से जूझ रहा था। केन्द्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों से नक्सली आतंक से मुक्त होकर यह क्षेत्र प्रगति के पथ पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।
मैं जनजातीय समाज से आती हूँ। देश के सुदूर अंचलों में रहने वाले समाज के इस वर्ग की अदम्य ऊर्जा और समस्याओं से मैं परिचित हूँ। उपयुक्त प्रोत्साहन मिले तो जनजातीय समाज के बेटे-बेटियाँ जीवन के हर क्षेत्र में देश का गौरव बढ़ा सकते हैं। इसके असंख्य उदाहरण आज पूरा देश देख रहा है।
यह क्षेत्र दण्डकारण्य भी कहलाता है। भगवान राम के वनवास से इसका संबंध बताया जाता है। वाल्मीकि रामायण में दण्डकारण्य के रूप में जिस विशाल भूभाग का वर्णन मिलता है, उसमें आपका यह क्षेत्र भी आता है। भगवान राम की महर्षि अगस्त्य समेत अनेक ऋषियों से भेंट होने, ऋषियों और समाज को परेशान करने वाले राक्षसों का संहार करने के अनेक प्रसंग इसी दण्डकारण्य के हैं। माता सीता का अपहरण, जटायु का रावण से संघर्ष और रामजी के माता शबरी के मिलने के प्रसंग भी दण्डकारण्य से जुड़े हैं।
देवियो और सज्जनो,
आज छत्तीसगढ़ के सामने विकास के अनेक द्वार खुल रहे हैं। इसके लिए मैं केन्द्र और राज्य सरकार को बधाई देती हूँ। आतंकवाद की पीड़ा को पीछे छोड़कर यह प्रदेश तीव्रता से आगे बढ़ रहा है। मुझे बताया गया है कि पिछले कुछ समय में जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सुविधा और बाजार से जोड़ने की पहलें और तेज की गयी हैं।
मुझे विश्वास है कि समतापरक और समावेशी विकास के माध्यम से 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ये कार्य उपयोगी होंगे। इस विकास यात्रा में जनजातीय समाज की प्रकृति-पोषक जीवन पद्धति से उपयोगी शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।
मुझे बताया गया कि कल आप लोग कुटुम्ब जात्रा का आयोजन करके बस्तर दशहरा के लिए पधारे ग्राम देवी-देवताओं की श्रद्धापूर्वक विदाई करेंगे। इसके बाद 27 अक्टूबर को माँ दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना करके उनकी और देवी मावली की डोली विदाई का आयोजन करेंगे। इन सामूहिक अनुष्ठानों को पीढ़ियों से उसी उत्साह से करते रहने की आपकी सांस्कृतिक परंपरा का मैं अभिनंदन करती हूँ।
आप सबके उज्ज्वल भविष्य और छत्तीसगढ़ राज्य के तीव्र गति से समग्र विकास की मैं कामना करती हूँ।
धन्यवाद!
जय हिन्द!
जय भारत!
